तेजस्वी का तेज और सिंधिया का…

ज्योतिरादित्य सिंधिया का मौजूदा सफर दुखद है। वही दूसरी तरफ बिहार में एक युवा का, नौवीं फेल तेजस्वी यादव द्वारा पूरे चुनाव का नरेटिव बदल देने का साहस राजनीति में एक ताजे हवा के झौंके की तरह है। एक तरफ विदेश से शिक्षा प्राप्त, महाराज की पृष्ठभूमि वाला, मीडिया का लाडला नेता इतना उपचुनाव लडाते हुए इतना हताश हो जाता है कि खुद को बार बार मैं कुत्ता हूं, हां मैं कुत्ता हूं कहने लगता है। दूसरी तरफ मीडिया की दुर्भावना का लगातार शिकार एक नौजवान आरोपों का जवाब देने के बदले केवल नौकरी, रोजगार, शिक्षा, युवाओं की ही बात करता चला जाता है। और छा जाता है।

यही भारतीय लोकतंत्र का मजा है, विविधता सुंदरता और उम्मीदों से भरी है। लेकिन साथ ही वक्त आने पर जनता द्वारा सही और गलत का फैसला लेने की समझदारी का भी प्रमाण है।

यहां तुलना करना कोई उद्देश्य नहीं। मगर परिस्थितियां कुछ इस तरह से बनीं है कि राजनीति में दो छोर बन गए है। एक ज्योतिरादित्य सिंधिया जिनके दलबदल की वजह से लाकडाउन में देर हुई और कोरोना महामारी के समय में मध्यप्रदेश मिनि चुनाव में झौंका गया। दूसरी तरफ बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी है जिन्होंने कहा कि यह समय चुनाव के लिए उपयुक्त नहीं है। पहले महामारी से लोगों को बचाया जाए, चुनाव फिर हो सकते हैं।

आम होता यह है कि विपक्ष चुनाव की मांग करता है मगर यहां तेजस्वी हर विकल्प के लिए तैयार थे। और लगातार आगाह कर रहे थे कि चुनाव कोरोना के खतरे को बढ़ाएगा। मगर समझा यह गया कि विपक्ष कमजोर है चुनाव से डर रहा है। इस समय चुनाव करवा लिए जाएं तो जीत सुनिश्चित है। कोरोना की चिन्ता किसी को नहीं थी। लेकिन यह दांव उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है। खासतौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को। जो सबसे ज्यादा स्मार्ट खेलने की कोशिश कर रहे थे।

लोगों को लग रहा है कि भाजपा ने उनका साथ छोड़ दिया है। चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी के अकेले पोस्टर लगाए जा रहे हैं। नीतीश को उसमें जगह लगभग नहीं दी गई है जबकि नीतीश कुमार अपने प्रचार में हर जगह नरेंद्र मोदी पर निर्भर दिख रहे है। मीडिया भी नीतीश का साथ छोड़ता दिख रहा है। कल तक जो मीडिया नीतीश को भारत का प्रधानमंत्री से लेकर दूसरी पार्टियों का अध्यक्ष तक बनवा रहा था आज उनका बचाव करने के बदले मुंगेर गोलीकांड पर उन्हें घेर रहा है।

हालांकि मीडिया तेजस्वी के सबसे ज्यादा विरोध में है। मगर अब नीतीश के फेवर में भी नहीं है। वह प्रधानमंत्री मोदी की समर्थन करते हुए ऐसा नरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है कि चारों तरफ अंधेरा फैल चुका है और ऐसे में मोदी ही बिहार को इम भंवर से निकाल सकते हैं। अति उत्साह में चैनल लोगों से यह भी कहलवा रहे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी जी चाहिए!

बिहार की कहानी में नीतीश कुमार का इस तरह बेआबारू होना बहुत निराशाजनक है। लेकिन लगातार अपनी विश्वसनीयता खोकर नीतीश खुद इस मुकाम तक पहुंचे हैं। दरअसल जरूरत से ज्यादा अपनी छवि को बनाने की कोशिश करने वाले नेताओं का अक्सर यह हश्र होता है। भाजपा से दूरी कायम करने के चक्कर में वे नरेन्द्र मोदी को दावत पर बुलाकर दावत वापस लेने जैसी असभ्यता कर चुके हैं। ऐसे ही 2105 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पाला बदल लिया। जिस भाजपा के खिलाफॉ लड़ कर चुनाव जीते थे उसी के साथ मिलकर सरकार बना ली।

जनादेश का ऐसा डाका इससे पहले शायद ही किसी ने डाला हो। वे ही नीतीश आज सबके लिए बोझ बन गए हैं। चाहे भाजपा हो या मीडिया कोई उन्हें ढोना नहीं चाह रहा। राजनीति की यह तल्ख सच्चाईयां हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इसी हकीकत का सामना कर रहे हैं। परिवार से मिली राजनीति को उन्होंने अपनी कमाई समझ लिया था। वे यह भूल गए थे कि उनके पिता माधवराव सिंधिया ने बहुत मेहनत करके राजनीति में एक मुकाम बनाया था। ज्योतिरादित्य इसे विरसात में मिले महल और दूसरे धन वैभव की तरह सहज चीज

समझ रहे थे। वह अपनी गौरवशली राजनीतिक विरासत की रक्षा नहीं कर पाए। जिसे बनाने में सिर्फ माधवराव का योगदान नहीं था बल्कि उनकी दादी जिन्हें ग्वालियर वाले सम्मान से राजमाता कहते थे उनका, उनकी बुआ वसुंधरा और यशोधरा राजे और मां माधवी राजे का भी बड़ा संघर्ष था।

आज ज्योतिरादित्य के साथ कोई नहीं खड़ा है। न मां, न पत्नी, न बेटा महाआर्यमन, न दोनों बुआएं और न ही कोई महल का पुराना वफादार। 2019 के लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य की पत्नी और बेटा उनके साथ प्रचार में थे। मगर अपने जीवन के इस सबसे कठिन चुनाव में वे निहायत ही अकेले पड़ गए हैं। कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार ने उन पर पचास करोड़ रु और मंत्री पद का लालच देने का गंभीर आरोप लगाया है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ज्योतिरादित्य के बचाव के लिए कोई बड़ा भाजपा नेता सामने नहीं आया है।

तभी निराशा में अब वे कभी कुत्ता हूं जैसा अशोभनीय भाषण दे रहे हैं तो कहीं मानसिक तनाव में वे कमल

के लिए वोट मांगना भूलकर हाथ के पंजे के लिए वोट मांग रहे हैं। समस्या यह है कि जिस सम्मान के नाम पर वे भाजपा में गए थे वह मिलना तो दूर उन्हें अब तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अपने बेटे महाआर्यमन के लिए कौन सी गुडविल छोडंगे? बेटे ने राजनीति में दिलचस्पी लेना शुरू की ही थी कि पिता ज्योतिरादित्य ने बिना किसी बड़े कारण के कांग्रेस छोड़ने का फैसला ले लिया। जो राज्यसभा उन्हें मिली है वह कांग्रेस भी दे रही थी।

फिर ऐसी कौन सी बड़ी वजह थी जिसे वे बता नहीं पा रहे हैं। जनता को वे संतुष्ट नहीं कर पाए। सम्मान की जिस की उन्होंने बात की वह किसी के गले नहीं उतरी। सबने कई कई बार देखा कि ज्योतरादित्य को नेहरू गांधी परिवार सिर्फ सम्मान ही नहीं परिवार के सदस्य की तरह स्नेह प्रेम देता था। शायद इस परिवार को कुछ विशेष लगाव है मध्य प्रदेश से जो यहां के लोग उनके परिवार में शामिल हो जाते हैं।

इन्दिरा गांधी कमलनाथ को अपना तीसरा बेटा कहती थीं। माधवराव विदेश में साथ में पढ़ने के कारण केवल राजीव गांधी के ही नहीं सोनिया गांधी के भी मित्र रहे थे। इसीलिए राहुल ने कहा था कि ज्योति तो उन एक मात्र लोगों में से थे जो मेरे पास कभी भी आ सकते थे। लेकिन ज्योतिरादित्य प्रेम की उस भाषा को समझनहीं पाए।

बिहार और मध्य प्रदेश से दस नवंबर को क्या नतीजे आएंगे किसी को नहीं मालूम। लेकिन कुछ नतीजे मतगणना से पहले आ चुके हैं। इनमें एक तो यह कि जनता को जब यह लग जाए कि उसे फिजुल की चीज समझा रहा है तो वह चाहे महाराजा सिंधिया हों या 15 साल मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार भ्रम तोड़ने में एक मिनट का भी समय नहीं लगाती। दूसरे यह कि मीडिया के जरिए आप चाहे जितना माहौल बनाओ की फलाना नेता ऐसा फलाना वैसा मगर एक समय आता है जब जनता के विवेक की आंखें खुल जाती हैं। और उसे अपना भला बुरा दिखने लगता है। झूठा नरेटिव मिनटों में तार तार हो जाता है।

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