कमलनाथ का ग्वालियर दौरा: “टाईगर अभी जिंदा है ……….. “

कमलनाथ का ग्वालियर दौरा हो गया है और कांग्रेस का कार्यकर्ता भी जिंदा हो गया है. आज की भीड़ देखकर तो यही लगता है, जनता अब सामंतवादी ताकतों से मुक्त होना चाहती है. किसी को उम्मीद नहीं थी, करीब साठ सत्तर हजार आदमियों की भीड़ जुट जायेगी.

नौजवानों और कार्यकर्ता का जोश इससे दस गुना अधिक बढ़ गया है. और यह उत्साह विपक्ष को ठंडे वस्ते में डालने में कारगर होगा.

कहा यह जा रहा है की ग्वालियर चंबल सिंधिया परिवार का गढ़ है. परंतु इस गढ़ में कांग्रेस की कितनी भूमिका रही होगी यह आज की रैली ने सिद्ध कर दिया है.

जनता सब समझ रही है धोखा तो हुआ है कमलनाथ की सरकार और कांग्रेस के कार्यकर्ता के साथ. यही वह प्लस पोइंट है. कमलनाथ के साथ, आवाज में खनक है और खनक सच्चाई के साथ हमेशा रहती है.

दूसरी तरफ भाजपा की सरकार है जो लूट में मिली है. डकैती डाली गई, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हक पर. ग्वालियर चंबल संभाग में जितने महाराज के प्यादे जो चुनाव लड़ रहे. जनता में जमीन खो चुके हैं.

रही सिंधिया परिवार के गढ़वाली बात तो यह तो केवल नकाब है. हकीकत में गढ़ तो ग्वालियर में बहुत पहले बजरंगी भाईजान ने ध्वस्त कर दिया था. भागकर इनको गुना का रुख करना पड़ा था. इसबार गुना की जनता ने भी आईना दिखा दिया है.

अब तो ओछी राजनीति की चालें बची हुई हैं. सब जानते हैं ऐसी राजनीति की उम्र बहुत कम होती है.

फिर सब जनता पर छोड़िये जनता बहुत समझदार हो गई है. और असली वोटर तो नौजवान है जो धारा का रुख मोड़ देता है और आज कमलनाथ के साथ नवयुवकों का जोश देखने लायक था. कह सकते हैं फिर से एक और क्रांति होने जा रही है, ग्वालियर चंबल संभाग से इंतजार करिये ” टाईगर अभी जिंदा है ” और शिकार करके रहेगा.

SBI ने एटीएम से पैसे निकालने का तरीका बदला ग्राहकों को होगा फायदा. 

अगर आप देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के ग्राहक हैं तो ये खबर आपके लिए है. दरअसल, आज यानी 18 सितंबर से एसबीआई के एटीएम से पैसे निकालने का तरीका बदल गया है. आइए जानते हैं इस नए नियम के बारे में.

एसबीआई ने एटीएम पर 10,000 रुपये और उससे अधिक के लेनदेन के लिए ओटीपी आधारित नकद निकासी सुविधा का दायरा बढ़ा दिया है. बैंक की ये सुविधा आज यानी 18 सितंबर से 24 घंटे उपलब्ध होगी. 

आपको बता दें कि बैंक ने इस साल जनवरी में अपने एटीएम पर 10,000 रुपये और इससे अधिक के लेनदेन के लिए ओटीपी आधारित निकासी सुविधा रात आठ बजे से सुबह आठ बजे के बीच शुरू की थी. फिलहाल, इसी अवधि में सुविधा का फायदा उठाया जा सकता है.

एसबीआई ग्राहकों को 10,000 रुपये और इससे अधिक की राशि की निकासी के लिए अपने एटीएम कार्ड पिन के साथ ही रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए ओटीपी को दाखिल करना होगा. ऐसा उन्हें प्रत्येक लेनदेन के लिए करना होगा. 

बैंक के मुताबिक 24 घंटे ओटीपी आधारित एटीएम निकासी सुविधा से ग्राहक फ्रॉड से बच सकेंगे. इस सुविधा से एसबीआई डेबिट कार्डधारकों को धोखेबाजी से बचने में मदद मिलेगी.

इसके साथ ही एसबीआई ने अपने सभी ग्राहकों से मोबाइल नंबरों को रजिस्टर्ड करने या अपडेट करने का आग्रह किया है. कहने का मतलब ये है कि अगर आप सुरक्षित लेनदेन चाहते हैं तो रजिस्ट्रेशन करा लें.  

बता दें कि ओटीपी आधारित नकद निकासी की सुविधा केवल एसबीआई के एटीएम में उपलब्ध है. दूसरे एटीएम में यह सुविधा विकसित नहीं 

किसान विधेयक क्या है आखिर क्यों हो रहा है विरोध

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों को इन विधेयकों के माध्यम से अपनी मर्जी से फसल बेचने की आजादी मिलेगी. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बरकरार रखा जाएगा.

नई दिल्ली .लोकसभा में पारित कृषि से जुड़े तीन अहम विधेयकों का पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक विरोध हो रहा है. इन विधेयकों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल से मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया. बीजेपी इन विधेयकों को किसानों के लिए क्रांतिकारी बता रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन विधेयकों को किसानों के लिए नुकसानदह बता रहे हैं. आइए, हम आपको बताते हैं विधेयक में क्या खास है और क्यों इनका विरोध हो रहा है.

लोकसभा में पारित हुए तीन कृषि विधेयक

कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020
मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा विधेयक 2020
आवश्यक वस्तु संशोधन बिल

पहले विधेयक के तहत- किसान मनचाही जगह पर फसल बेच सकते हैं. बिना किसी रुकावट दूसरे राज्यों में भी कारोबार कर सकते हैं. APMC के दायरे से बाहर भी खरीद-बिक्री संभव है. ऑनलाइन बिक्री इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग से होगी, जिससे मार्केटिंग लागत बचेगी और बेहतर दाम मिलेंगे. फसल की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

दूसरे विधेयक के तहत- राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग की व्यवस्था बनेगी. रिस्क किसानों का नहीं, एग्रीमेंट करने वालों पर होगा. किसान कंपनियों को अपनी कीमत पर फसल बेचेंगे. किसानों की आय बढ़ेगी, बिचौलिया राज खत्म होगा. तय समय सीमा में विवाद निपटारे की व्यवस्था होगी.

तीसरे विधेयक के तहत- अनाज, दलहन, खाद्य तेल, आलू-प्याज आवश्यक वस्तु नहीं होंगे. उत्पादन, स्टोरेज, डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म होगा. फूड सप्लाई चेन के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी. उपभोक्ताओं के लिए भी कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी. सब्जियों की कीमतें दोगुनी होने पर स्टॉक लिमिट लागू होगी.

आखिर क्यों हो रहा है इन बिल का विरोध
दरअसल, किसान और व्यापारियों को इन विधेयकों से एपीएमसी मंडियां खत्म होने की आशंका है. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 में कहा गया है कि किसान अब एपीएमसी मंडियों के बाहर किसी को भी अपनी उपज बेच सकता है, जिस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, जबकि एपीएमसी मंडियों में कृषि उत्पादों की खरीद पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मंडी शुल्क व अन्य उपकर हैं. पंजाब में यह शुल्क करीब 4.5 फीसदी है.

लिहाजा, आढ़तियों और मंडी के कारोबारियों को डर है कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो कोई मंडी आना नहीं चाहेगा. वहीं, पंजाब और हरियाणा में एमएसपी पर गेहूं और धान की सरकारी खरीद की जाती है. किसानों को डर है नए कानून के बाद एमएसपी पर खरीद नहीं होगी क्योंकि विधेयक में इस संबंध में कोई व्याख्या नहीं है कि मंडी के बाहर जो खरीद होगी वह एमएसपी से नीचे के भाव पर नहीं होगी.

पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस पहले से ही विधेयक का विरोध कर रही है. किसानों, आढ़तियों और कारोबारियों की आशंका को लेकर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कहते हैं कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो फिर मंडी में कोई शुल्क देना क्यों चाहेगा.

सरकार का क्या कहना है
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने लोकसभा में कृषि क्षेत्र से संबंधित दो विधेयकों के पारित होने का स्वागत करते हुए कहा कि ये किसानों को सशक्त बनाएंगे और कृषि के भविष्य पर इनका व्यापक प्रभाव पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि ये कानून न केवल किसानों को सशक्त बनाएंगे बल्कि ये किसानों और व्यापारियों के लिए एक समान पारिस्थिति का निर्माण करेंगे, जिससे अनुकूल प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार पारदर्शिता में सुधार होगा. किसान पहली बार अपने खेतों से सीधे बिक्री कर सकते हैं.

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देश भर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों के जल्द निपटारे की मांग .


नई दिल्ली

सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों का हो जल्द निपटारासुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिसों को दी खास जिम्मेदारीकेसों पर लगे हाई कोर्ट की रोक को हटाने का भी दिया है निर्देश

देश भर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों के जल्द निपटारे की मांग पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से निचली अदालत में लंबित ऐसे मुकदमों की खुद निगरानी करने को कहा है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर किसी मुकदमे पर हाई कोर्ट ने रोक लगा रखी हो, तो उसे जल्द से जल्द हटाया जाए.

इससे पहले कोर्ट को जानकारी दी गई थी कि देश भर में पूर्व और वर्तमान सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की संख्या 4600 से भी ज्यादा है. यही नहीं कोर्ट को यह भी बताया गया था कि इनमें से कुछ मुकदमे तो 40 साल तक पुराने हैं, लेकिन उनमें अभी तक आरोप तक तय नहीं हो पाए हैं.

आपको बता दें कि इससे पहले इस मामले से जुड़ी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में वह विस्तृत आदेश जारी करेगा. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सांसदों/विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले में सुनवाई में तेजी लाने को लेकर जो भी फैसला आएगा उसका वह स्वागत करेगी. इसके साथ ही सरकार ने सुझाव दिया था कि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए समय सीमा भी निर्धारित कर सकती है.

बता दें कि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि केंद्रीय एजेंसियों के पास जो मामले हैं. उसमें कुछ मामले तो दो-तीन दशक से लंबित हैं, सरकार क्या कर रही है?

उदयपुर पांच सितारा होटल लक्ष्मीविलास के विनिवेश के मामले में सीबीआई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए विनिवेश को रद्द किया है. 

नई दिल्ली

सीबीआई कोर्ट ने होटल पर कब्जा लेने का दिया था आदेशप्रशासन से 3 दिन में रिपोर्ट फाइल करने का निर्देश दियाहोटल के कर्मचारी ने विनिवेश के खिलाफ 18 साल लड़ा केस

जोधपुर सीबीआई कोर्ट के आदेश पर उदयपुर जिला प्रशासन ने लक्ष्मी विलास होटल को ललित होटल ग्रुप से अपने कब्जे में ले लिया है और वहां पर राज्य सरकार का बोर्ड लगा दिया है. सीबीआई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि होटल पर कब्जा लेकर 3 दिन में कोर्ट के अंदर रिपोर्ट फाइल करें. कोर्ट के आदेश के बाद आज सुबह राज्य सरकार के अधिकारी पहुंचे और होटल को अपने कब्जे में लिया.

पांच सितारा होटल लक्ष्मीविलास के विनिवेश के मामले में सीबीआई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए विनिवेश को रद्द किया है. 18 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आए इस ऐतिहासिक फैसले के बाद लोगों में खुशी का माहौल है. 

अंबालाल की जुनून से होटल वापस मिला.  इस विनिवेश को रद्द कराने के पीछे अंबालाल नायक का जुनून भी काफी काम आया है. दरअसल, उदयपुर के कालका माता इलाके में रहने वाले अंबालाल नायक होटल के विनिवेश के समय लक्ष्मी विलास के कर्मचारी थे.

विनिवेश के फैसले को गलत बताते हुए उन्होंने इसके खिलाफ कोर्ट में चैलेंज कर दिया था . नायक ने इस विनिवेश को बाद में घोटाला और भ्रष्टाचार बताते हुए इस मामले को कोर्ट में घसीट दिया. नायक ने कहा कि सरकारी संपति लक्ष्मी विलास की वैल्यू को कम आंक कर इसे ललित ग्रुप को बेच दिया गया.

हालांकि इन सब के बीच नायक ने हार नहीं मानी और अपने जुनून के मार्फत इस विनिवेश के विरोध में कोर्ट में लड़ाई लड़ते रहे. अंबालाल नायक द्वारा 18 साल से किए जा रहे इस संघर्ष को अब जाकर न्याय मिला है और सरकार ने लक्ष्मीविलास को अपने कब्जे में लिया है.

जिला प्रशासन द्वारा होटल के बाहर सरकारी संपति का बोर्ड लगा दिया गया है. साथ ही प्रॉपर्टी के वेरिफिकेशन की कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है. नायक को अपने जुनून के मार्फत मिली इस जीत के बाद उनके परिवार में भी खुशी का माहौल है.

पर्दे के पीछे की कहानी

2002 में होटल ललित ग्रुप को दे दिया गया लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के इस फैसले पर कभी अंगुली नहीं उठाई गई. 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद इस मसले पर पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने सरकार पर लगातार हमले शुरू कर दिए.

इन हमलों के बीच सीबीआई को नायक की शिकायत मिली और सीबीआई ने जांच शुरू कर दी. बाद में सीबीआई ने दो बार इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट लगाने चाहे, लेकिन सीबीआई कोर्ट जोधपुर ने इसकी इजाजत नहीं दी और सीबीआई कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि आप जांच पूरी कर इस मामले में जांच रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखें.

हरसिमरत कौर ने कृषि बिल के ख़िलाफ़ दिया इस्तीफ़ा, मोदी बोले किसानों को भ्रमित कर रही हैं शक्तियाँ, स्तीफा स्वीकार

नई दिल्ली

शिरोमणि अकाली दल की नेता और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कृषि विधेयक के ख़िलाफ़ केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

उन्होंने ट्वीट किया है, “मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया है. किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है.”

उन्होंने प्रधानमंत्री को सौंपे अपने इस्तीफ़े में लिखा है कि कृषि उत्पाद की मार्केटिंग के मुद्दे पर किसानों की आशंकाओं को दूर किए बिना भारत सरकार ने बिल को लेकर आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया है. शिरोमणि अकाली दल किसी भी ऐसे मुद्दे का हिस्सा नहीं हो सकती है जो किसानों के हितों के ख़िलाफ़ जाए. इसलिए केंद्रीय मंत्री के तौर पर अपनी सेवा जारी रखना मेरे लिए असभंव है.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, “हज़ारों किसान सड़क पर हैं. मैं ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहती जिसने सदन में बिना किसानों की चिंताओं के बारे में बात किए बिल पास कर दिया. यही वजह है कि मैंने इस्तीफ़ा दिया.”

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा, “हम किसानों के साथ खड़े हैं और उनके लिए कुछ भी करेंगे. इसके बाद अगला फ़ैसला अब हमारी पार्टी. थोड़ी ही देर में हमारी पार्टी की एक बैठक होगी.”

स्तीफा हुआ स्वीकार

पीएम मोदी से सलाह के बाद भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कैबिनेट मंत्रिमंडल से हरसिमरत कौर के इस्तीफे को तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है. राष्ट्रपति ने केंद्रीय मंत्री परिषद से हरसिमरत का इस्तीफा संविधान के अनुच्छेद 75 के खंड (2) के तहत स्वीकार किया है. 

प्रधानमंत्री द्वारा सलाह-मशविरा के बाद राष्ट्रपति ने निर्देश दिया कि कैबिनेट मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को उनके मौजूदा विभागों के अलावा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय का प्रभार भी सौंपा जाए.

बता दें कि मोदी कैबिनेट से अपने इस्तीफे की जानकारी हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट कर दी थी. अपने ट्वीट में उन्होंने कहा कि मैंने किसान विरोधी अध्यादेशों और कानून के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है. किसानों के साथ उनकी बेटी और बहन के रूप में खड़े होने का गर्व है. हरसिमरत कौर बादल केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग मंत्री थीं. यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि बीजेपी की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल अध्यादेश का विरोध कर रही है.

इससे पहले गुरुवार को जब बिल को लोकसभा में पेश किया गया तो शिरोमणि अकाली दल के सांसद सुखबीर सिंह बादल ने विरोध किया था. उन्होंने सरकार को बड़ा झटका देते हुए कहा था कि हरसिमरत कौर बादल मंत्रीपद से इस्तीफा देंगी. हालांकि, शिरोमणि अकाली दल का सरकार को समर्थन जारी रहेगा.

Haircare Tips: बाल को काला करने में अदरक है कमाल, जानिये कैसे इस्तेमाल से होगा लाभ 

Tips to remove White/Grey Hair: बालों को काला करने के लिए लोग तमाम हेयर प्रोडक्ट्स यूज करते हैं, मगर इनमें मौजूद केमिकल्स बालों को डैमेज कर सकते हैं

अदरक को औषधीय गुणों से भरा हुआ माना जाता है।‌ इसलिए कई बीमारियों में इसका सेवन करने की सलाह दी जाती है। अदरक खांसी, बुखार और जुखाम जैसी बीमारियों में लाभदायक माना जाता है। कोरोना वायरस से लड़ने में भी इसे कारगर माना गया है। इसके सेवन से शरीर से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अदरक आपके बालों के लिए भी लाभकारी है। बालों को काला करने के लिए और सफेद होने से बचाने के लिए अदरक को बहुत कारगर माना गया है।

लोग अक्सर बढ़ती उम्र के साथ अपने सफेद बालों को देखकर परेशान महसूस करते हैं। ऐसे में वह कई तरह के तेल, शैम्पू, औषधि और केमिकल युक्त हेयर कलर आदि का इस्तेमाल भी करते हैं। जो कि उनके बालों को कुछ समय के लिए तो काला कर देता है, लेकिन साथ ही इससे हेयर डैमेज भी होता है। ऐसे में अदरक का इस्तेमाल करने से केमिकल हेयर कलर से होने वाले साइड इफेक्ट से बचा जा सकता है। बालों को काला करने के लिए अदरक को बहुत अच्छा माना जाता है।


ऐसे करें इस्तेमाल: अदरक लेकर उसे साफ पानी से धो लें। फिर उसे कद्दूकस करें। फिर इसे निचोड़कर सारा रस निकाल लें। उसमें बराबर मात्रा में शहद मिलाएं। इस मिश्रण को आधे घंटे के लिए बालों में लगाएं। इसके बाद बिना शैम्पू लगाए सिर्फ पानी से बाल धोएं। बाल सूखने पर तेल लगाएं। इसे एक-दो हफ्ते के बाद लगाया करें। इससे जल्द ही बाल काले हो जाएंगे।

2. दो चम्मच कलौंजी को 24 घंटे के लिए भिगोएं। अब उसको मिक्सी में पीस लें। फिर उसमें समान मात्रा में अदरक का रस मिलाएं। इस मिश्रण को हर हफ्ते एक से दो घंटे अपने बालों में लगाएं। इससे बाल काले हो जाते हैं। यह मिश्रण बालों को सफेद होने से भी रोकता है।

3. एक बड़ा प्याज लें। उसे कद्दूकस कर उसका रस निकाल लें। फिर उसमें चार से पांच चम्मच अदरक का रस मिलाएं। इस मिश्रण को दो से तीन घंटे बालों में लगाकर रखें। फिर साफ पानी से अपने बाल धोएं और सूखने पर तेल लगाएं। इससे बाल हेल्दी, चमकदार और काले होते हैं.

हीरो के साथ सोकर मिलते हैं फिल्मों में 2 मिनट के रोल’: कंगना ने जया बच्चन को जवाब देते हुए किया नया खुलासा

महाराष्ट्र सरकार और कंगना रनौत के बीच अभी जुबानी जंग खत्म भी नहीं हुई थी कि संसद सत्र में जया बच्चन की स्पीच ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी। कंगना ने इसी बहस की प्रतिक्रिया में एक नया ट्वीट किया और कहा कि उन्होंने इंडस्ट्री को फेमेनिज्म सिखाया और यहाँ देश भक्ति व नारी प्रधान फिल्में की।

कंगना ने एक ट्वीट के रिप्लाई में लिखा, “कौन सी थाली दी है जया जी और उनकी इंडस्ट्री ने? एक थाली मिली थी जिसमें दो मिनट के रोल आइटम नम्बर्ज़ और एक रोमांटिक सीन मिलता था वो भी हीरो के साथ सोने के बाद। मैंने इस इंडस्ट्री को फ़ेमिनिज़्म सिखाया, थाली देश भक्ति नारी प्रधान फ़िल्मों से सजाई, यह मेरी अपनी थाली है जया जी आपकी नहीं।”

बता दें कि कल जया बच्चन ने संसद सत्र में अपने भाषण के दौरान रवि किशन को निशाना बनाते हुए ताना दिया था कि ऐसे लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। इसके बाद रवि किशन का जवाब आया और जया बच्चन ट्विटर पर ट्रेंड करनी लगी। कंगना रनौत ने भी इस बीच जया बच्चन से पूछा कि जैसा उनके साथ हुआ वैसा उनकी बेटी श्वेता के साथ होता या जैसा सुशांत के साथ हुआ वैसे उनके बेटे अभिषेक के साथ होता तो भी क्या वह ऐसे ही कहतीं?

उनके इस ट्वीट पर 3 हजार से ज्यादा कमेंट आए। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता डॉ उदित राज ने इसका रिप्लाई देते हुए कंगना रनौत को नालायक बता दिया। डॉ उदित राज ने लिखा, “कंगना रनौत आप जैसी नालायक बेटी जया बच्चन की होती तो उसके साथ ऐसा ही होता।”

यहाँ बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता डॉ उदित राज इससे पहले भी कंगना पर टिप्पणी कर चुके हैं। महाराष्ट्र राज्यपाल से मिलने पर कंगना के लिए डॉ उदित राज ने कहा था कि वह नशेड़ी और भाजपा समर्थक हैं। उन्होंने ट्वीट में लिखा था, “नशेड़ी कंगना रनौत से आज राज्यपाल मिले। गोदी मीडिया, भाजपा आईटी सेल और भक्त सभी समर्थन कर रहे हैं। चोर, अपराधी और भ्रष्ट सभी का स्वागत बशर्ते भाजपा का समर्थक हो।”

आपने बुलाया है तो आ जाऊँगा लेकिन मेरे पास गाड़ी नहीं है’ – वो मोदी, जो PM नहीं थे लेकिन वचन के पक्के थे

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज 70 साल के हो गए। देश और दुनिया के सामने जितना कुछ नज़र आता है, वह है सिर्फ एक तस्वीर। तस्वीर में सब कुछ अति उत्तम है लेकिन तस्वीर में सब कुछ इतना बेहतर हुआ कैसे? इसके जवाब पर चर्चा का दायरा सीमित है।

स्टेशन पर अपने पिता के साथ चाय बेचने से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कमान संभालने तक… 7 दशकों की यात्रा में ऐसे अनेक मौके आए, जब देश के प्रधानमंत्री के सामने हालात सामान्य नहीं थे। ऐसा ही एक किस्सा है, जब उन्हें एक समाचार समूह से चर्चा में शामिल होने का बुलावा आया और उन्होंने कहा उनके पास गाड़ी नहीं है।  

इससे पहले उनके जीवन के अन्य पहलुओं को जान लेते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने बचपन में स्वभाव के बेहद शरारती थे, अक्सर साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात का ज़िक्र भी किया है। एक बार मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने इस बारे में एक किस्सा भी साझा किया । उन्होंने बताया था कि बचपन में शहनाई वालों को इमली का लालच देकर उनका ध्यान हटाया करते थे।

नरेन्द्र मोदी पढ़ाई में औसत थे पर उन्हें रंगमंच का बहुत ज़्यादा शौक था, उन्होंने कई नाटकों में भी हिस्सा लिया था। बचपन में सभी का कोई न कोई नाम होता है, नरेन्द्र मोदी का भी था। नरेन्द्र मोदी के दोस्त उन्हें ‘नरिया’ कह कर पुकारते थे। उन्हें यह नाम बहुत पसंद नहीं था लेकिन वह इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चर्चाओं के लिहाज़ से कितने कुशल हैं, सोशल मीडिया पर मौजूद कई वीडियो क्लिप्स इस बात की तसदीक करती है. साक्षात्कारों से हट कर और प्रधानमंत्री बनने से पहले भी नरेन्द्र मोदी के ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं, जिनमें उन्होंने अपनी बात पूरी जिम्मेदारी से रखी.

नरेन्द्र मोदी के लिए क्या इन चर्चाओं तक हिस्सा बनने का सफ़र भी बहुत आसान रहा? नहीं। यह संघर्षों से भरा था। संघर्षों से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा है, जब नरेन्द्र मोदी को एक समाचार चैनल की परिचर्चा में शामिल होने का मौक़ा मिला था। 

90 के दशक का अंत था। टीवी चैनल का दायरा काफी बढ़ चुका था। लोग समझ चुके थे कि यह संचार का एक बड़ा माध्यम बनने वाला है। खासकर राजनीतिक दृष्टिकोण से। समाचार चैनल्स में चर्चाएँ शुरू हो चुकी थीं, हर राजनीतिक दल अपने नेता-प्रवक्ता भेजा करता था। कुल मिला कर ज़िम्मेदारी बस एक होती थी, अपने दल का नज़रिया मज़बूती से रखना।

यह वाकया भी तभी का है। एक चैनल में  एक चर्चा आयोजित कराई गई, जिसमें लगभग हर दल के नेता को बुलावा भेजा गया। भाजपा में विजय मल्होत्रा को निमंत्रण मिला, लेकिन किसी कारणवश कार्यक्रम से कुछ ही समय पहले उनका आना रद्द हो गया। 

चैनल वाले परेशान। अब किसे बुलाएँ BJP से? नामों की खोजबीन शुरू हुई और नरेन्द्र मोदी को बुलावा भेजा गया। अब तक वह ऐसी चर्चाओं की अहमियत बखूबी समझ चुके थे। उस वक्त तक वह एक अच्छे हिन्दी भाषी वक्ता के रूप में स्थापित भी हो चुके थे, लिहाज़ा आने के सवाल पर उन्होंने तुरंत हामी भर दी।

समस्या लेकिन टली नहीं। क्योंकि एक दुविधा थी। स्पष्टवादी मोदी ने तुरंत चैनल को अपनी दुविधा बताई। उन्होंने कहा, “मैं कार्यक्रम में आने के लिए तैयार हूँ लेकिन मेरे पास वाहन नहीं है।” यह तब की बात है, जब नरेन्द्र मोदी 9 अशोका मार्ग स्थित भाजपा कार्यालय के पास अन्य संघ प्रचारकों के साथ रहते थे। 

चैनल की ओर से उनसे कहा गया कि वह टैक्सी से आ सकते हैं, बाद में इसका भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन कार्यक्रम ऑन एयर होने में सिर्फ चंद मिनट का समय शेष था, और नरेन्द्र मोदी की कोई ख़बर नहीं थी। सब इंतज़ार कर ही रहे थे, तभी मोदी मौके पर नज़र आ गए।

नरेन्द्र मोदी जानते थे कि वह किसी दूसरे नेता के स्थान पर आए हैं लेकिन उन्होंने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई। यह इकलौती ऐसी घटना नहीं है, जब प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ अपनी बात रखने के लिए परेशानियों का सामना किया हो लेकिन जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटे। 

दूसरा किस्सा जुलाई 2001 में हुई  सम्मेलन का है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ भारत आए थे। इस दौरान भी चैनल पर राजनीतिक दलों के नेताओं की ज़रूरत थी। मुश्किल के समय में एक बार फिर समाचार समूह ने नरेन्द्र मोदी से संपर्क किया और इस बार भी उन्होंने निराश नहीं किया।

चर्चा से कुछ देर पहले खूब बारिश होने लगी। सिग्नल न होने की वजह से नरेन्द्र मोदी को कई घंटे इंतज़ार करना पड़ा। क्योंकि वह मौजूद रहने का वादा कर चुके थे, इसलिए काफी देर इंतज़ार करने के बावजूद भी चर्चा में शामिल हुए।

इन दोनों ही घटनाओं में एक बात पूरी तरह समान थी कि नरेन्द्र मोदी हर बुलावे को सहर्ष स्वीकार करते थे। इसके बाद अपने राजनीतिक दल का पक्ष पूरी तैयारी से रखते  थे। वह अपने नज़रिए और पार्टी के एजेंडे दोनों को लेकर कभी भ्रम में नहीं रहे।

साल 2001 में पहली बार गुजरात की कमान संभालने से लेकर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों तक… काफी कुछ देखने और झेलने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक का सफ़र तय किया। फ़िलहाल देश की सत्ताधारी पार्टी के सामने कई चुनौतियाँ हैं लेकिन जनता ने अभी तक इस चेहरे पर पूरा भरोसा जताया है।    

पुस्तक साभार – The Election That Changed India