एक्शन पर रिएक्शन, चीन ने भी लगाई अमेरिकी लोगों के वीजा पर पाबंदी

हांगकागं के मसले पर अमेरिका की प्रतिक्रिया में चीन ने भी अमेरिका से आने वाले लोगों के वीजा पर पाबंदी लगाने का फैसला किया है. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोमवार को कहा कि चीन ने अमेरिका के कर्मचारियों पर वीजा पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है.

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि अमेरिका की तरफ से हांगकांग से संबंधित मुद्दों पर खराब बर्ताव के बाद यह फैसला लिया गया है. इससे पहले अमेरिका ने चीनी लोगों के वीजा पर पाबंदी लगाने का फैसला किया था.

अमेरिका पहले ही लगा चुका है पाबंदी

अमेरिका ने शुक्रवार को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था. अमेरिका ने उन पर हांगकांग में मानवाधिकारों और स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों के हनन का आरोप लगाया था.

इसके बाद चीन ने भी हांगकांग संबंधित मुद्दों को लेकर चीनी अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध लगाने के अमेरिका के फैसले का कड़ा विरोध जताया था. साथ ही चीन ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए वह मजबूत कदम उठाता रहेगा.

कोरोना वायरस का पूरी दुनिया में संक्रमण फैलने के बाद से अमेरिका और चीन के रिश्ते खराब हुए हैं. हांगकांग के लिए चीन के सुरक्षा कानून ने ट्रंप को विशेष आर्थिक पैकेज को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रेरित किया जिसने हांगकांग को एक वैश्विक वित्तीय केंद्र रहने की अनुमति दी है.

बहरहाल, जारी बयान में अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन को चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा में अपनी प्रतिबद्धताओं और दायित्वों का सम्मान करने का आह्वान किया था. अमेरिका ने कहा था कि हांगकांग को अपनी स्वायत्तता का इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है. इसमें मानव अधिकार और मौलिक स्वतंत्रता, जिसमें अभिव्यक्ति और शांति की स्वतंत्रता भी शामिल है. इन अधिकारों का हांगकांग प्रशासन की तरफ से संरक्षित किया जाना चाहिए.

चीन ने जताई थी कड़ी प्रतिक्रिया

अमेरिका के फैसले पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है. चीन ने शनिवार को हांगकांग संबंधित मुद्दों को लेकर चीनी अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध लगाने के अमेरिका के फैसले का कड़ा विरोध जताया. साथ ही चीन ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए वह मजबूत कदम उठाता रहेगा.

शिवराज कैबिनेट में सिंधिया गुट का होगा दबदबा, बीजेपी क्या अपनों को करेगी नाराज?

आनंदीबेन पटेल को मध्य प्रदेश के राज्यपाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलने के बाद शिवराज कैबिनेट के विस्तार की चर्चा तेज हो गई है. मंगलवार को संभावित शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार में ज्योतिरादित्य सिंधिया का पूरी तरह से दबदबा है. माना जा रहा है कि शिवराज कैबिनेट में कम से कम 9 से 10 सिंधिया समर्थकों को मंत्री बनाया जा सकता है. हालांकि, इसके लिए बीजेपी को अपने कई दिग्गज नेताओं को नजरअंदाज करना होगा. ऐसे में देखना होगा कि बीजेपी कैसे जोखिम भरा कदम उठाती है.

बता दें कि कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्‍विजय सिंह से अनबन होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था. इसके बाद सिंधिया के 22 समर्थक विधायकों ने भी कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था, जिसमें 6 कैबिनेट मंत्री भी शामिल थे. इसी के बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी हो सकी है, जिसमें सिंधिया समर्थकों की अहम भूमिका रही है.

सिंधिया खेमे का कैबिनेट में रहेगा दखल

कमलनाथ की कैबिनेट में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के 6 लोग शामिल थे. बीजेपी में वह 22 पूर्व विधायकों के साथ आए हैं. इनमें से सिंधिया के गुट के 2 लोग तुलसीराम सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत पहले से कैबिनेट में शामिल है बाकी सात से आठ लोग और भी मंत्री बनाए जा सकते हैं. इनमें इमरती देवी, प्रद्युमन सिंह तोमर, महेंद्र सिंह सिसोदिया और प्रभुराम चौधरी के नाम तय हैं, क्योंकि ये लोग कैबिनेट मंत्री का पद छोड़कर बीजेपी में आए हैं.

इसके अलावा सिंधिया समर्थकों में बिसाहूलाल सिंह, हरदीप सिंह डंग, एंदल सिंह कंसाना, राजवर्धन सिंह दत्तीगांव और रणवीर जाटव भी कैबिनेट मंत्री के प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं. डंग और बिसाहूलाल सिंह मंत्री न बनने की वजह से ही कांग्रेस में नाराज थे और इसी के चलते विधायक पद से इस्तीफा दिया था. शिवराज कैबिनेट में इतने लोगों की एंट्री के बाद सिंधिया खेमे का दखल काफी बढ़ जाएगा. हालांकि, उपचुनाव को देखते हुए बीजेपी को समीकरण साधने के लिए इन्हें कैबिनेट में जगह देना मजबूरी बन गया है.

वहीं, बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता मंत्रिमंडल में शामिल होने की बाट जोह रहे है. इसी को लेकर शिवराज सिंह चौहान खासे पसोपेश में नजर आ रहे हैं. मध्य प्रदेश में मंत्री पद सीमित है और कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में समायोजित करना है यह ढेड़ी खीर बनता जा रहा है. दरअसल विधायकों की कुल संख्या के आधार पर शिवराज कैबिनेट में ज्यादा से ज्यादा 35 विधायक मंत्री बन सकते हैं. ऐसे में अगर सिंधिया समर्थक गुट के 9 से 10 नेताओं का मंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है. इस तरह से करीब 25 फीसदी कैबिनेट पर सिंधिया का कब्जा होगा.

वहीं, बीजेपी के लिए सबसे ज्यादा समस्या आ रही है बुंदेलखंड क्षेत्र से जहां गोपाल भार्गव जैसे दिग्गज और वरिष्ठ नेता हैं तो वहीं शिवराज के करीब पूर्व गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह भी मौजूद हैं. इस क्षेत्र से पहले ही सिंधिया खेमें से गोविंद सिंह राजपूत को मंत्री बनाया जा चुका है. एक ही जिले से तीन मंत्री बनाना शायद संभव नहीं हो पा रहा. साथ ही कई ऐसे विधायक भी मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए बेताब हैं, जो बीजेपी के टिकट से लगातार जीतते आ रहे हैं. इनमें शैलेंद्र जैन और प्रदीप लारिया का नाम सबसे आगे हैं. ऐसे ही माथा पच्ची विंध्य और मेवाड़-निमाड़ इलाके में है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के दम पर बीजेपी ने मध्य प्रदेश में सरकार तो बना ली है. लेकिन क्या बीजेपी सिंधिया समर्थकों के आगे अपने ही कद्दावर और वरिष्ठ नेताओं को नाराज और नजरअंदाज करने का जोखिम भरा कदम उठा पाएगी?

पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर आतंकी हमला, दो की मौत, बिल्डिंग में कई लोग फंसे

इस्लामाबाद 
कराची के पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में सोमवार को हुए आतंकी हमले में दो लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हैं। हमले की सूचना मिलने के बाद पाकिस्तान रेंजर्स के जवान भी घटनास्थल पर पहुंचकर मोर्चा संंभाल लिया। सिंध रेंजर्स के मुताबिक पाकिस्तान के स्टॉक एक्सचेंज में घुसे चारों आतंकियों को मार गिराया गया है। बताया जा रहा है कि घायलों में कई की हालत नाजुक बनी हुई है।
मारे गए चारों हमलावर 
पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, सुबह नौ बजे के आस-पास 4 की संख्या में घुसे आतंकियों ने पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज की बिल्डिंग में घुसे और अंधाधुंध गोलियां चलाई। आतंकियों ने मेन गेट के पास ग्रेनेड भी फेंका। जानकारी के मुताबिक पहला कारोबारी दिन होने के कारण काफी लोग एक्सचेंज में मौजूद थे। इसमें से एक हमलावर को गेट पर मारा गया, जबकि दो को स्टॉक एक्सचेंज के अंदर मारा गया। 

लोगों को बिल्डिंग से बाहर निकाला गया 

हमले की जानकारी मिलने के बाद पहुंचे पाकिस्तानी रेंजर्स और सिंध पुलिस के जवानों ने बिल्डिंग में फंसे लोगों को बाहर निकाला इस दौरान मेन गेट को सील कर दिया गया। लोगों को बाहर निकालने के लिए पिछले गेट का उपयोग किया गया। अब सुरक्षाकर्मी पूरी बिल्डिंग की तलाशी ले रहे हैं। 

बिल्डिंग के आस-पास का इलाका सील 

सुरक्षाबलों ने बिल्डिंग के आस-पास का इलाका भी सील कर दिया है। आसपास की बिल्डिंगों पर स्लाइनपर्स भी तैनात किए हैं। मारे गए आतंकियों के पास से हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया है। वहीं अधिकारियों ने बतााया है कि कई घायलों की हालत गंभीर है, जिससे मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है।

चीन ही नहीं सरकार पर जब-जब हमलावर हुई कांग्रेस, मोदी के रक्षाकवच बने शरद पवार

लद्दाख में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 जवानों की शहादत को लेकर कांग्रेस सख्त तेवर अख्तियार किए हुए है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार नरेंद्र मोदी सरकार पर हमलावर हैं और एक के बाद एक सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के सहयोगी एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने चीन मामले पर मोदी सरकार के बचाव और राहुल गांधी को ही आईना दिखाने का काम किया है. हालांकि, चीन ही नहीं बल्कि मोदी सरकार को कांग्रेस जब-जब घेरने की कोशिश की है तो शरद पवार हर बार मोदी के रक्षा कवच बनकर सामने खड़े नजर आए हैं.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बारे में सच बोलें और अपनी जमीन वापस लेने के लिए कार्रवाई करें तो पूरा देश उनके साथ खड़ा होगा. इस पर एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा, ‘हम नहीं भूल सकते कि 1962 में क्या हुआ था. चीन ने हमारी 45 हजार स्क्वेयर किमी जमीन पर कब्जा कर लिया था. यह जमीन अब भी चीन के पास है, लेकिन वर्तमान में मुझे नहीं पता कि चीन ने जमीन ली है या नहीं, मगर इस पर बात करते वक्त हमें इतिहास याद रखना चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए.’

पवार ने कहा कि यह किसी की नाकामी नहीं है. अगर गश्त करने के दौरान कोई (आपके क्षेत्र में) आता है, तो वे किसी भी समय आ सकते हैं. हम यह नहीं कह सकते कि यह दिल्ली में बैठे रक्षा मंत्री की नाकामी है. उन्होंने कहा कि मुझे अभी युद्ध की कोई आशंका नहीं दिखती है. चीन ने जाहिर तौर पर हिमाकत तो की है, लेकिन गलवान में भारतीय सेना ने जो भी निर्माण कार्य किया है वह अपनी सीमा में किया है.

चीन मामले को लेकर पिछले दिनों हुई सर्वदलीय बैठक के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कई सवाल उठाए और कहा था कि अब भी देश एलएसी से जुड़े कई मुद्दों पर अंधेरे में है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सवाल खड़े किए थे कि सैनिकों को बिना हथियार के किसने भेजा था. इस पर एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने नसीहत देते हुए कहा कि चीन सीमा पर सैनिक हथियार लेकर गए थे या नहीं, यह अंतरराष्ट्रीय समझौतों द्वारा तय होता है. हम को ऐसे संवेदनशील मुद्दों का सम्मान करना चाहिए.

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बता दें कि राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी शरद पवार के बयान के गहरे राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं. 2014 के बाद से कई बार ऐसे मौके आए हैं जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार बीजेपी के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर खड़े नजर आए हैं. खासकर यह तब देखनो मिला है जब किसी मुद्दे पर मोदी सरकार को कांग्रेस ने घेरने की जबरदस्त कोशिश की हो.

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी भी एनसीपी प्रमुख शरद पवार को सार्वजनिक मंच से अपना गुरु बता चुके हैं. मोदी सरकार में ही शरद पवार पद्म विभूषण से भी नवाजे गए. शायद यही वजह भी है की जब भी मोदी किसी मुसीबत में होते हैं शरद पवार हमेशा उन्हें मदद के लिए तैयार रहते हैं. राफेल डील मामले पर उन्होंने मोदी सरकार को क्लील चिट दिया था तो सीएए पर सरकार के समर्थन में खड़ने नजर आए थे.

राफेल डील के मामले पर जब पूरा विपक्ष मोदी सरकार को घेरने में जुटा हुआ था. राहुल गांधी राफेल मामले को लेकर मोदी सरकार पर लगातार हमलावर थे. ऐसे में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने विपक्ष से अलग अपनी राजनीति लाइन खींचते हुए मोदी सरकार के लिए रक्षा कवच की भूमिका में नजर आए थे. शरद पवार ने राफेल पर मोदी सरकार को एक तरह से क्लीन चिट देते हुए कहा था कि लोगों को पीएम मोदी की नीयत पर कोई शक नहीं है. उन्होंने कहा था कि राफेल विमान खरीदारी के तकनीकी पहलुओं पर चर्चा करने की विपक्ष की मांग ठीक नहीं है.

राफेल पर बैकफुट पर चल रही बीजेपी के लिए पवार का बयान राहत देने का काम किया था. बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा था है कि पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में सच बोल रहे हैं. शाह ने राहुल गांधी पर तंज करते हुए कहा कि उन्हें कम से कम अपने गठबंधन के पुराने सहयोगी रहे शरद पवार से ही बुद्धिमानी सीखनी चाहिए.

बता दें कि 2014 महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी बहुमत के आंकड़े से 18 सीट पीछे रह गई थी. नतीजों के तुरंत बाद एनसीपी ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने का ऐलान कर दिया था. गुजरात चुनाव के वक्त जब कांग्रेस समेत विपक्ष बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकने की तैयारी में थी, चुनाव से ठीक पहले एनसीपी ने कांग्रेस के साथ न जाने का फैसला किया. माना जाता है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला.

वहीं, पिछले साल राज्यसभा के डिप्टी स्पीकर चुनाव के दौरान ये खबर थी कि एनसीपी, विपक्ष की ओर से एनडीए के सामने अपना उम्मीदवार उतारेगी. लेकिन आखिरी मौके पर एनसीपी शरद पवार ने अपना उम्मीदवार उतरने से मना कर दिया था. इसी के बाद कांग्रेस ने बीके हरिप्रसाद को राज्यसभा के डिप्टी स्पीकर के लिए अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन जीत नहीं सके. ऐसे कई मौके आए जब शरद पवार मोदी सरकार के साथ खड़े नजर आए.

नेपाल में भारत को दुश्मन बनाने पर क्यों तुले हुए हैं ओली, क्या है वजह?

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली अपनी कुर्सी पर मंडराते खतरे को देखकर भारत विरोधी राष्ट्रवाद के अपने पुराने फॉर्मूले को आजमा रहे हैं. नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर और बाहर अपनी नीतियों और कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नेपाल के पीएम ओली ने रविवार को बयान दिया कि नई दिल्ली और काठमांडू में उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं.

नेपाल के नेता मदन भंडारी की 69वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि भले ही उन्हें पद से हटाने का खेल शुरू हो गया हो लेकिन ये कोशिश सफल नहीं होगी. प्रधानमंत्री ओली ने दावा किया कि काठमांडू के एक होटल में उन्हें हटाने के लिए बैठकें की जा रही हैं और इसमें एक दूतावास भी सक्रिय है.

ओली ने अपने संबोधन में कहा कि नेपाल के कई नेताओं ने मुझसे कहा कि अपनी जमीन को समेटते हुए जो नक्शा छापा है, वह बहुत बड़ी भूल है, ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. देश का नया नक्शा जारी करने और संसद में इसे पारित कराने की वजह से मुझे सत्ता से बेदखल करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं. ओली ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इससे पहले जब उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के साथ ट्रेड‌ एंड ट्रांजिट समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, तो उनकी सरकार गिरा दी गई थी, लेकिन अब उनके पास बहुमत है. 

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली पिछले कुछ वक्त से अपने देश के भीतर भारत के खिलाफ आक्रामक बयान देकर जनभावनाएं भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. भारत की आपत्ति के बावजूद पहले उन्होंने नया नक्शा जारी किया, उसके बाद नया नागरिकता कानून लाने का ऐलान कर दिया जिसके तहत नेपाली पुरुषों से शादी करने वाली महिलाओं को सात साल बाद नेपाल की नागरिकता मिलेगी. इसे नेपाल-भारत के बीच कायम रोटी-बेटी के रिश्ते को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. यही नहीं, ओली ने अपने देश में कोरोना वायरस फैलने के लिए भी भारत को ही जिम्मेदार ठहराया. हालांकि, ओली का ये भारत विरोध बेवजह नहीं है.

ओली सरकार अपनी घरेलू राजनीति में चौतरफा आलोचना का शिकार हो रहे हैं. कोरोना वायरस की महामारी को ठीक तरह से हैंडल ना कर पाने को लेकर ओली के खिलाफ नेपाल की सड़कों पर लोग विरोध-प्रदर्शन करने भी उतरे. खुद को घिरता देखकर ओली ने नेपाल का नया नक्शा जारी कर दिया. इस नए नक्शे में भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को शामिल किया गया था. ओली के इस कदम से ज्यादातर नेपाली खुश हुए. इसके जरिए ओली कुछ समय के लिए जनता का ध्यान भटकाने में भी कामयाब रहे

हालांकि, नक्शा पास होने के कुछ वक्त बाद ही ओली के आलोचकों ने फिर से बहस शुरू कर दी. पिछले कुछ दिनों में ओली की पार्टी के भीतर ही उनके इस्तीफे की मांग तेज हो गई है. ओली को भी ये बात अच्छी तरह से पता है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ एकजुट हो गए हैं और इसीलिए वह समिति की बैठक में भी जाने से बच रहे हैं.

सेंट्रल कमिटी मेंबर महेश्वर दहल ने काठमांडू पोस्ट से बातचीत में कहा, “पार्टी की चल रही बैठक में मुद्दों को सामने रखने के बजाय ओली बाहर जाकर अपनी राय रख रहे हैं जिससे फायदे से ज्यादा नुकसान ही होगा. ये हैरान करने वाला है कि प्रधानमंत्री पार्टी की बैठक से गायब रहते हैं और दूसरे मंच पर जाकर पार्टी के नेताओं के खिलाफ बोलते हैं. निश्चित तौर पर, इससे पार्टी के भीतर संघर्ष बढ़ेगा.”

ओली को सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहल से मिल रही है. पुष्प कमल दहल पार्टी प्रमुख हैं और नेपाल के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं. वह कई बार अप्रत्यक्ष तौर पर ओली पर निशाना साध चुके हैं. यहां तक कि बुधवार को स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में दहल ने ओली का नाम लिए बिना कहा कि कुर्बानियां तो देनी होंगी. पार्टी के सूत्रों और विश्लेषकों का मानना है कि दहल और उनके सहयोगी यह मांग करने जा रहे हैं कि ओली या तो पार्टी अध्यक्ष रहें या फिर प्रधानमंत्री पद पर. दहल के साथ माधव कुमार नेपाल, झाला नाथ खनाल, बामदेव दौतम, नारायम काजी श्रेष्ठ जैसे वरिष्ठ नेता हैं. दहल के नेतृत्व वाला धड़ा ओली पर पार्टी पर कब्जा करने और एकतरफा फैसले लेने का आरोप लगाता है.

कहा जा रहा है कि ओली ने रविवार को नई दिल्ली और काठमांडू में साजिशों की बात कही, उसमें इशारा दहल की तरफ ही था. स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य और दहल के करीबी मत्रिका यादव ने कहा, “किसी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की बात नहीं की है लेकिन जब से दहल ने कुर्बानी वाली बात कही है ओली काफी परेशान नजर आ रहे हैं. अगर वह अपने कामकाज की शैली नहीं बदलते हैं तो पार्टी उनके खिलाफ फैसला ले सकती है.”

कई लोग ओली की रणनीति में फंसकर भारत पर लगाए गए आरोपों को सच मान रहे हैं. समर्थकों का मानना है कि नए नक्शे पर भारत की नाराजगी को लेकर जो नेता सरकार का विरोध कर रहे हैं, उनको आईना दिखाकर ओली बिल्कुल ठीक कर रहे हैं. स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य और ओली के करीबी सत्य नारायण मंडल ने काठमांडू पोस्ट से कहा, “सबको पता है कि भारत ओली को सत्ता के बाहर करना चाहता है, वो भी एक मिनट में नहीं बल्कि कुछ सेकेंडों में. और हमारे कुछ लालची नेता इसे भुनाने की कोशिश कर रहे हैं और सरकार के उठाए गए कदमों का विरोध कर रहे हैं.”

वैसे ओली का राष्ट्रवादी राग नया नहीं है खासकर जब कोई भी संकट की घड़ी हो. 2015 में भारतीय सीमा पर हुई अघोषित आर्थिक नाकेबंदी का विरोध कर और चीन के साथ ट्रेड ऐंड ट्रांजिट पर हस्ताक्षर करने के बाद भी ओली ने इसी तरह भारत के खिलाफ अपना राष्ट्रवादी राग छेड़ा था. रविवार को दिए भाषण में ओली ने एक बार फिर चीन से हुए समझौते का जिक्र किया और यह जताने की कोशिश कि कैसे बहुमत में ना होने की वजह से उनकी सरकार को गिरा दिया गया था. दरअसल, अगस्त 2016 में दहल माओस्ट पार्टी की अगुवाई कर रहे थे और उन्होंने ओली की सरकार गिराने के लिए नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया था.

हालांकि, साल 2017 के अंत में, ओली और दहल ने चुनावी गठबंधन कर लिया और फरवरी 2018 में ओली ने बहुमत के साथ सरकार बना ली. मई 2018 में, ओली की सीपीएन-यूएमएल और दहल की सीपीएन (माओवादी) ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाने के लिए मर्जर का ऐलान कर दिया. हालांकि, दोनों पार्टियों के एकीकरण की प्रक्रिया अभी भी पूरी नहीं हुई है और ओली-दहल के बीच मतभेद लगातार बढ़ते जा रहे हैं.

ओली और दहल के गुट आमने-सामने हैं. दहल के गुट का आरोप है कि ओली पार्टी और सरकार को एकतरफा फैसलों से चलाने की कोशिश कर रहे हैं. वर्तमान में चल रही स्टैंडिंग कमिटी की बैठक भी ओली के विरोधियों ने ही बुलाई है जिसमें ओली नदारद ही रहे. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि अगर दहल का गुट ओली से अपनी शर्तें मनवाने में असफल रहता है तो वे फिर संसदीय दल से उन्हें कुर्सी से हटाने की कोशिश करेंगे. ओली के खिलाफ अगर अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है तो ओली को करीब 8 सीटों की कमी पड़ सकती है.

विरोधियों के लगातार बढ़ रहे दबाव के बीच ओली ने रविवार को दहल पर निशाना साधा. ओली ने कहा, “अगर किसी को लगता है कि वे मुझे सत्ता से बाहर कर सकते हैं तो मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि हमारी राष्ट्रीय एकता इतनी कमजोर नहीं है. नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी पार्लियामेंट्री पार्टी किसी के बहकावे में नहीं आएगी. बेहतर होगा कि हर कोई ये बात समझ ले कि नया नक्शा यूं ही नहीं प्रकाशित कर दिया गया था.”

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ओली एक बार फिर से अहम मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए राष्ट्रवाद का कार्ड खेल रहे हैं. सोशल मीडिया पर राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर लोकराज बरल ने कहा, “अपनी ही पार्टी के विरोधियों के बीच फंसे पीएम ओली ने अब अपनी सरकार गिराने में विदेशी ताकतों की तरफ इशारा करना शुरू कर दिया है. मझधार में फंसे शासक की यही रणनीति होती है.”

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पूर्व आर्मी चीफ वीके सिंह का नया दावा, उस दिन चीनी तंंबू में लगी रहस्यमय आग, तब भड़के थे भारतीय सैनिक

नई दिल्ली 
क्या भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प की वजह चीनी तंबू में लगी रहस्यमय आग थी? केंद्रीय मंत्री और पूर्व आर्मी चीफ वीके सिंह ने ऐसा दावा किया है। वीके सिंह का कहना है कि अचानक लगी आग से भारतीय सैनिक भड़क उठे थे। उनके मुताबिक, यह कह पाना मुश्किल है कि चीनी सैनिकों ने तंबू में क्या रखा हुआ था जिससे वह आग लगी। हालांकि, वीके सिंह का यह दावा अबतक सामने आ रही बात से थोड़ा अलग है। अबतक कहा जा रहा था कि चीनी सैनिकों के पीछे न हटने की बात पर भारतीय सैनिकों ने तंबू उखाड़कर फेंका था।

अब वीके सिंह ने कहा कि 15 जून की रात जब कमांडिंग ऑफिसर संतोष बाबू पेट्रोल पॉइंट 14 पहुंचे तो पाया कि चीन ने वहां से तंबू नहीं हटाया था। वह तंबू यह देखने के लिए लगाया गया था कि भारतीय सेना पीछे गई या नहीं। फिर जब बातचीत में दोनों के पीछे जाने की बात हुई तो संतोष बाबू ने चीनी सैनिकों से उसे हटाने को कहा। वीके सिंह से मुताबिक, PLA जवान तंबू हटा रहे थे कि अचानक की उसमें आग लग गई। अबतक साफ नहीं है कि चीनियों ने तंबू में क्या रखा हुआ था। वीके सिंह कहते हैं कि इसके बाद ही सैनिकों के बीच पहले बहस हुई जो फिर हिंसक झड़प तक पहुंच गई। 

पीपी 14 क्यों कब्जाना चाहता है चीन, वीके सिंह ने बताया 

वीके सिंह ने एबीपी न्यूज से हुई बातचीत में कहा कि 1962 के बाद से ही पेट्रोल पॉइंट 14 (पीपी 14) हमारे पास है। अब भारत ने श्योक नदी के साथ-साथ रोड बनाई है जो दौलत बेग ओल्डी तक जाती है। पहले जो सामान 15 दिन में पहुंचता था वह इस सड़क की मदद से सिर्फ 2 दिन में पहुंच जाता है। वीके सिंह के मुताबिक, चीन की तरफ से उसे यह सड़क नहीं दिखती। इससे ही चीनी सेना में खलबली है। इस सड़क पर नजर बनी रहे इसके लिए उसने पीपी 14 पर दावा करना शुरू कर दिया, उसके सैनिकों ने आगे आने की कोशिश की जिन्हें भारतीय जवानों ने रोक दिया। 

वीके सिंह के मुताबिक, दोनों देशों के बीच जब बातचीत हुई तो यह हुआ कि स्थिति वैसी रहेगी जैसी 15 जून से पहले तक थी। यानी चीनी सेना को पीछे जाना था। यह भी तय हुआ था कि पीपी 14 पर, उसके पीछे 2 किलोमीटर तक और 5 किलोमीटर के दायरे में कितने-कितने सैनिक रह सकते हैं। लेकिन चीन ने इसका पालन नहीं किया। 

पनडुब्बी के बाद जापान ने खदेड़ा चीनी बॉम्बर, एशिया में घिरे चीन ने दी धमकी

टोकियो 
लद्दाख में भारत के साथ उलझे चीन को जापानने अच्छा सबक सिखाया है। जापानी एयरस्पेस में घुसे चीन के एक बॉम्बर प्लेन को जापानी एयरफोर्स के फाइटर जेट्स ने दूर तक खदेड़ दिया। कुछ दिन पहले ही जापानी नौसेना ने एक चीनी पनडुब्बी को ऐसे ही मार भगाया था। एशिया में विस्तारवादी मानसिकता को संजोने वाला चीन अब पूर्वी चीन सागर में जापान के साथ द्वीपों को लेकर उलझा हुआ है। वहीं जापान ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में चीन की हर हरकत का माकूल जवाब दिया जाएगा।
जापानी रक्षा मंत्रालय ने जारी किया बयान 
जापानी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पूर्वी चीन सागर में जापानी द्वीप ओकिनावा और मियाको के बीच चीनी एच -6के स्ट्रेटजिक बॉम्बर का पता लगाया गया। जिसके बाद जापानी एफ-16 फाइटर जेट्स ने उड़ान भर चीन के इस एयरक्राफ्ट को अपनी सीमा से बाहर भगा दिया। 

परमाणु हमला करने में सक्षम चीनी बॉम्बर 

चीनी एच -6 के बॉम्बर को लंबी दूरी पर स्थित टारगेट को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह विमान परमाणु हमला करने में भी सक्षम है। चीन ने इस विमान को विशेष रूप से अमेरिका के बेस को निशाना बनाने के लिए शामिल किया है। इसके पिछले मॉडल में मिसाइल की क्षमता सीमित थी लेकिन इसे अपग्रेड कर अब और उन्नत बनाया गया है। 

द्वीपों को लेकर जापान से भिड़ा चीन 

चीन और जापान में पूर्वी चीन सागर में स्थित द्वीपों को लेकर आपस में विवाद है। दोनों देश इन निर्जन द्वीपों पर अपना दावा करते हैं। जिन्हें जापान में सेनकाकु और चीन में डियाओस के नाम से जाना जाता है। इन द्वीपों का प्रशासन 1972 से जापान के हाथों में है। वहीं, चीन का दावा है कि ये द्वीप उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं और जापान को अपना दावा छोड़ देना चाहिए। इतना ही नहीं चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी तो इसपर कब्जे के लिए सैन्य कार्रवाई तक की धमकी दे चुकी है। 

जापानी नेवी करती है इन द्वीपों की रखवाली 

सेनकाकू या डियाओस द्वीपों की रखवाली वर्तमान समय में जापानी नौसेना करती है। ऐसी स्थिति में अगर चीन इन द्वीपों पर कब्जा करने की कोशिश करता है तो उसे जापान से युद्ध लड़ना होगा। हालांकि दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी सैन्य ताकत वाले चीन के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा। पिछले हफ्ते भी चीनी सरकार के कई जहाज इस द्वीप के नजदीक पहुंच गए थे जिसके बाद टकराव की आशंका भी बढ़ गई थी। 

जापान ने भारतीय नौसेना के साथ किया युद्धाभ्यास 

जापानी नौसेना ने ट्वीट किया कि 27 जून को जापान मैरिटाइम सेल्फ डिफेंस फोर्स के JS KASHIMA और JS SHIMAYUKI ने भारतीय नौसेना के आईएनएस राणा और आईएनएस कुलीश के साथ हिंद महासागर में एक अभ्यास किया। इसके जरिए जापान मैरिटाइम सेल्फ डिफेंस फोर्स ने भारतीय नौसेना के साथ अपने समझ और सहयोग को बढ़ाया।

चीन समुद्र में चला रहा पावर गेम 

साउथ चाइना सी में ‘जबरन कब्‍जा’ तेज कर दिया है। पिछले रविवार को चीन ने साउथ चाइना सी की 80 जगहों का नाम बदल दिया। इनमें से 25 आइलैंड्स और रीफ्स हैं, जबकि बाकी 55 समुद्र के नीचे के भौगोलिक स्‍ट्रक्‍चर हैं। यह चीन का समुद्र के उन हिस्‍सों पर कब्‍जे का इशारा है जो 9-डैश लाइन से कवर्ड हैं। यह लाइन इंटरनैशनल लॉ के मुताबिक, गैरकानूनी मानी जाती है। चीन के इस कदम से ना सिर्फ उसके छोटे पड़ोसी देशों, बल्कि भारत और अमेरिका की टेंशन भी बढ़ गई है। 

देश में 24 घंटे में रिकॉर्ड 14,229 मरीज पूरी तरह हुए स्‍वस्‍थ

कोरोना वायरस का संक्रमण बीते दस दिनों में बहुत तेजी से बढ़ा है। रविवार को एक ही दिन में 20 हजार नए मामले आ गए और अभी तक सवा पांच लाख पार संक्रमित हो चुके हैं लेकिन इसके बावजूद राहत भरी खबर यह है कि देश में अब रिकवरी रेट बहुत सुधर गया है। बीते 24 घंटों में 14 हजार मरीज पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं और स्‍वस्‍थ्‍य होने वालों की तादाद अब 1 लाख से अधिक हो गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश में पहली बार कोरोना वायरस संक्रमण के करीब 20 हजार नए मामले सामने आए हैं। कोरोना संक्रमण की जांच भी लगातार बढ़ रही है। एक दिन में रिकॉर्ड 2.31 लाख से अधिक सैंपल की जांच की गई है। अब तक 82.27 लाख सैंपल की जांच की जा चुकी है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देशभर में कोरोना जांच करने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या 1,036 हो गई है। इसमें 749 सरकारी और 287 निजी प्रयोगशालाएं हैं। मौजूदा समय में 1,055 अस्पतालों में पूरी तरह से कोरोना के मरीजों का इलाज हो रहा है। इनमें 1,77,529 आइसोलेशन बेड, 23,168 आइसीयू बेड और 78,060 ऑक्सीजन की सुविधा वाले बेड उपलब्ध हैं।

MP: विदिशा में बिना हाथ-पैर के जन्मी बच्ची, डॉक्टरों ने दुर्लभ बीमारी को बताया कारण

डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी के कारण कई बार शरीर के कुछ अंग या तो निर्मित नहीं हो पाते या पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते. डॉक्टरों ने इसे एक जेनेटिक समस्या बताया है.

विदिशाः मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक ऐसी बच्ची ने जन्म लिया है, जिसकी असामान्य शारीरिक बनावट ने परिवार सहित गांववालों को हैरानी में डाल दिया है. 26 जून को जन्मी इस बच्ची के शरीर में सिर्फ सिर और धड़ है. शरीर में न तो एक भी हाथ है और न कोई पैर और इसको देखकर ही सब हैरान हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक ये एक बहुत दुर्लभ बीमारी है.

बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ

विदिशा में सिरोंज तहसील के सांकला गांव में शुक्रवार 26 जून की रात इस बच्ची का जन्म हुआ. हालांकि बच्ची के शरीर में हाथ और पैर नहीं हैं, जो कि टेट्रा-एमेलिया सिंड्रोम के कारण हुआ है. इस बच्ची की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं.

रिपोर्ट्स के मुताबिक सिरोंज के सरकारी अस्पताल के एक डॉक्टर ने बताया कि बच्ची के शरीर में इन अंगों की कमी के अलावा किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं है और उसका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है.

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बच्ची का जन्म घर में ही उसकी दादी ने किया और बच्ची का परिवार उसे अस्पताल नहीं ले जाना चाहता. उनका मानना है कि ये भगवान की देन है.

1 लाख नवजात में 1 मामला

माना जा रहा है कि ये बीमारी 1 लाख नवजात में से सिर्फ एक में पाई जाती है. ये एक जेनेटिक बीमारी है, जिसमें शरीर के कुछ हिस्सों का या तो निर्माण नहीं हो पाता या फिर उनका पूरी तरह से निर्माण नहीं होता.

हालांकि परिवार का दावा है कि इस बच्ची से पहले परिवार में कोई भी सदस्य किसी भी तरह की शारीरिक कमी के साथ पैदा नहीं हुआ.