आईपीएस बनाम कॉडर अफसरों के बीच बढ़ रही तनातनी, नए सर्विस रूल बनाने पर हो रहा विचार

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (सीएपीएफ) के कॉडर अफसरों के बीच दोबारा से तनातनी बढ़ गई है। 6 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कॉडर अफसरों के पक्ष में फैसला दिया है। कोर्ट ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईजी के पचास फीसदी पदों को डेपुटेशन के जरिए भरने पर लगी रोक को जारी रखा है। केंद्र सरकार ने कोविड-19 को आधार बनाकर कहा था कि सीएपीएफ में आईजी के पदों को भरा जाना जरूरी है। सरकार ने अपनी दलील में तात्कालिकता यानी ‘अर्जेन्सी’ का हवाला देकर स्टे हटाने की गुजारिश की थी। इससे कोर्ट सहमत नहीं हुई और केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर नए सिरे से एप्लीकेशन देने का आदेश जारी कर दिया। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार अब कॉडर अफसरों की मांग को ध्यान में रखकर सर्विस रूल्स में बदलाव करने पर विचार कर रही है।इस मामले का हल करने के लिए जो कमेटी बनाई गई थी, उससे भी रिपोर्ट मांगी गई है। संभावित है कि अदालत में केंद्र सरकार इस मामले का कोई सर्वमान्य हल पेश करे।

तारीख पर तारीख, मगर समाधान कुछ नहीं निकला…

इससे पहले खुद दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी ‘आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ को लेकर कॉडर अधिकारियों के पक्ष में फैसला दे चुका है, मगर अभी तक उसका पालन नहीं किया गया। बल के सेवानिवृत अधिकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने कथित तौर पर आईपीएस एसोसिएशन का पक्ष लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का हल करने के लिए एक कमेटी गठित करने की बात कह दी। इसके लिए गत वर्ष 30 नवंबर तक का समय लिया गया था। उसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 31 मार्च 2020 तक का समय लेने के लिए आवेदन दे दिया। इस साल भी वह तारीख आगे बढ़ती जा रही है। हाईकोर्ट ने सीएपीएफ में आईजी के पचास फीसदी पदों को डेपुटेशन के जरिए भरने पर रोक लगा दी थी। अब सोशल मीडिया पर भी आईपीएस बनाम कॉडर विवाद बढ़ता जा रहा है। सीएपीएफ से रिटायर्ड अधिकारी वीपीएस पंवार और एसएस संधू बताते हैं कि अगर कॉडर अफसर अपने हकों की बात मीडिया में करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। सीएपीएफ के दस हजार अफसर अपनी परमोशन को लेकर चिंतित हैं। बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन इस अवधि में कॉडर अफसर मुश्किल से कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। उसे आईजी बनने में 33 साल लग जाते हैं।डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान सीएपीएफ में ‘आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। ये अभी तक नहीं बने हैं।

सीएपीएफ में जब तक सर्विस रूल नहीं बदले जाते, तब तक सरकारी घोषणा का फायदा नहीं…

वीपीएस पंवार का कहना है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में हकों की लड़ाई जीतने के बाद केंद्र सरकार हरकत में आई थी। सरकार ने घोषणा कर दी कि सीएपीएफ अधिकारियों को संगठित कॉडर के सभी फायदे मिलेंगे। सरकार ने इन्हें संगठित कॉडर सेवा के सभी फायदे देने की घोषणा तो कर दी, लेकिन उसके लिए डीओपीटी द्वारा जारी आदेशों का पालन नहीं किया गया। डीओपीटी ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कॉडर अफसरों के लिए नए सर्विस रूल बनाने की बात कही थी। केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई काम ही नहीं किया। कॉडर अफसरों का कहना है कि जब तक पुराने भर्ती नियमों में संशोधन नहीं हो जाता और नए सर्विस नियम नहीं बन जाते, तब तक केंद्र सरकार की घोषणा बेमानी है। इस हालत में तो केवल 20 फीसदी अफसरों को ही लाभ मिल पाएगा। पवार के अनुसार, इस मामले में सरकार की नीयत ठीक नहीं है। मामला सुलझाने के लिए जो कमेटी बनाई गई, उसमें आईपीएस शामिल किए गए। कॉडर अधिकारियों को इससे दूर रखा गया। शर्त भी यह लगाई कि कमेटी की बैठक में केवल एडीजी या उससे बड़े रैंक वाले अफसर ही भाग लेंगे।अब कॉडर अफसरों में तो इक्का दुक्का ही एडीजी रैंक तक पहुंचते हैं। बीएसएफ और सीआरपीएफ में आईपीएस के लिए तय डीआईजी के अधिकांश पद खाली पड़े हैं, जबकि आईजी के पद भर जाते हैं। वजह, इन बलों में डीआईजी की फील्ड पोस्टिंग होती है। वहां कोई नहीं जाना चाहता। सीआईएसएफ में अधिकांश पद इसलिए भरे रहते हैं क्योंकि यहां पर मेट्रो एवं दूसरे शहरों में ड्यूटी मिलती है।

इतने साल की सर्विस के बाद मिलता है सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड … 

कॉडर अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार की 55 संगठित कॉडर वाली सेवाओं में अधिकतम बीस साल बाद सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड मिलता है। इसके बाद आईएएस अधिकारी जेएस रैंक पर और आईपीएस, आईजी के पद पर चला जाता है।लिहाजा ये कॉडर सर्विस हैं, इसलिए इनमें टाइम बाउंड परमोशन यानी एक तय समय के बाद पदोन्नति मिल जाती है। इन सेवाओं में रिक्त स्थान नहीं देखा जाता।जगह खाली हो या न हो, मगर तय समय पर परमोशन जरूर मिलती है; सीएपीएफ में परमोशन उस वक्त होती है, जब सीट खाली होती है। अगर किसी फोर्स में एक साथ कई बटालियनों का गठन होता है तो ही परमोशन की कुछ संभावना बनती है।इसे नॉन प्लान ग्रोथ कहा जाता है। डीओपीटी ने इस बाबत भी दिशा निर्देश जारी कर कहा था कि किसी भी फोर्स में नॉन प्लान ग्रोथ नहीं होगी। जो भर्ती होगी, वह प्लांड वे ही की जाएगी। 2001 और 2010 में भर्ती नियमों को बदला गया, लेकिन उनमें इतनी ज्यादा विसंगतियां थी कि उससे अफसरों को फायदा होने की बजाए नुकसान हो गया। केंद्र सरकार ने पिछले साल जो फायदा देने की बात कही, वह पुराने भर्ती नियमों पर आधारित है। वर्तमान समय में जो भर्ती नियम हैं, वे ओजीएएस और एनएफएफयू की मूल भावना को लागू नहीं होने देंगे। इसलिए ज़रूरी है कि पुराने भर्ती नियमों में संशोधन किया जाए या नए सर्विस नियम बनाए जायें।

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