रवीन्द्र नाथ टैगोर की सामाजिक चेतना.

▪जयंती पर विशेष:-


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➖डा.भूपेन्द्र विकल➖
गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर एक बड़े ,सही मायने में मुकम्मल साहित्यकार थे।
उनका लेखन या उनका जीवन कर्मप्रधान रहा।
उनकी रचनाएं देश काल की सीमा लाकर वैश्विक हुई ।निरंतर इस बात के लिए प्रसिद्ध रहते थे, पूर्व और पश्चिम दोनों का सामाजिक सरोकार बने ।
जिसके आधार पर विश्व एक सूत्र में बंध जाए। उनके दृष्टिकोण ने उन्हें विश्व कवि के रूप में सम्मानित किया।नोवल पुरस्कार भी प्रदान किया।
उनकी कलम में जादुई ताकत थी ।उनका जीवन दर्शन ने एक विशेष छाप छोड़ी। उनका सामाजिक मूल्यांकन भी जरूरी है।इसका जवाब उनके जीवन दर्शन में तलाशा जा सकता है।
शिक्षा का सर्वाधिक प्रचार प्रसार ,स्वास्थ्य ,नारी कल्याण, सामाजिक उन्नति के सूचक बना।
उनकी दूरगामी दृष्टि का परिचायक है ।
मानव के पारस्परिक सहयोग एवं सर्वोपरि मानते थे। वर्तमान मे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के जीवन दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ गई है ।जब हमारा समाज टूटने की कगार पर है ,मानवीय मूल्यों को का क्षरण हो रहा है, वर्ण व्यवस्था का भूत अब भी लोगों के दिलो-दिमाग पर हावी है ,नारी विज्ञापन की वस्तु है, उसे समाज में परोसा जा रहा है।
गुरुदेव की रचनाओ का समय काल, नवजागरण का काल था । समाज के प्रति उनका अपना दृष्टिकोण था ।जिसका प्रयोग उन्होंने अपने जीवन की प्रयोगशाला में किया।
1905 के बंग भंग आंदोलन के दौरान उनमें जो देश प्रेम जागृत हुआ ।वह आजीवन एक देशभक्त की तरह कायम रहा गांधी जी के साथ में मिले थे ।लेकिन उनके जीवन दर्शन और गांधी के जीवन दर्शन में बहुत फर्क था गुरुदेव ने शांतिनिकेतन की स्थापना की तो गांधी ने साबरमती आश्रम की दोनों ने ही देश तथा समाज के लिए काम किया।
गुरुदेव का एक व्यापक सोच विचार था। प्राणी जगत से नैसर्गिक जगत के साथ युक्त होकर एक बडे जीवन बहुत को तलाशना मैं इस शब्द के केंद्र से मुक्त होकर समाज देश नैसर्गिक पृथ्वी महा जगत को भी अपने अंदर अंतरमुखी कर लेते हैं ।उनकी सामाजिक भावना भी असल में इसी दिशा में प्रयास का एक बड़ा बड़ा हिस्सा था ।समतामूलक समाज व्यवस्था के पक्षधर थे ।
गुरुदेव के जीवन काल में भी यही सारी समस्याएं थी ।उसे उन्होंने बहुत करीब से देखा ।सतीदहा ,विधवा विवाह आदि के सवाल थे।इनकी रचनाओं में भी इनका चित्रण है ।अपने पुत्र की शादी एक विधवा के साथ करा कर समाज को संदेश देने की कोशिश की थी ।
उनके दृष्टिकोण से नारी का स्वाधीनता बोध तथा सामाजिक उन्नयन की भावना और दूरगामी दृष्टि पर लिखित होती है ।हिंदू और मुस्लिम के सौहार्द्र कायम रहने के लिए उन्होंने पल्ली समाज की स्थापना की थी । उन्होंने सभी वर्गों के लोगों को जोड़ा गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर शिक्षा में अंग्रेजी के साथ-साथ मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे ।अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित नए लोगों को भारतीय सनातन समाज में बोध के प्रति व्यापक दृष्टि थी ।
गुरुदेव का चिंतन था कि उच्च शिक्षा में अंग्रेजी के साथ-साथ बंगला में भी शिक्षा हो इसका मुख्य कारण यह था कि अपनी मातृभाषा में किसी चीज को समझना आसान होता है। इसे अपनी उपलब्धि बांटना आसान होता है । दूसरे को भी अपनाना सहज होता है। इसकी आवश्यकता आज भी है।
उनके जीवन दर्शन में ग्राम उत्थान भी जुड़ा हुआ था।ग्राम उत्थान के पछधर थे।
गु्रुदेव का सामाजिक चिन्तन महत्वपूर्ण है।
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