क्या कोई देश अधिक नोट छाप कर बन सकता है अमीर? जानें नोटों की प्रिंटिंग के पीछे का गणित

नई दिल्ली, देश और दुनिया कोरोनावायरस की वजह से अभूतपूर्व संकट से जूझ रही है। कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया के अधिकतर हिस्सों में लॉकडाउन लागू है। इससे लोगों की आजीविका पर बहुत अधिक असर पड़ा है। दुनियाभर के अधिकतर देशों में लोग अपनी सरकारों से सीधी मदद मांग रहे हैं। हालांकि, सरकारों के हाथ भी बंधे हुए हैं और वह एक सीमा तक ही राहत पैकेज दे सकती है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता होगा कि किसी भी देश के पास नोट छापने की अपनी मशीन होती है तो वह बड़ी संख्या में नोट छापकर गरीबों, वंचितों और मध्यम वर्ग के लोगों को क्यों नहीं बांट देता है? इसके साथ ही एक और सवाल कौंधता होगा कि गरीब देश अधिक-से-अधिक नोट छापकर अमीर क्यों नहीं बन जाते हैं? ऐसे में हमने एक्सपर्ट्स से बात करके इस बारे में जानना चाहा कि आखिर केंद्रीय बैंक या सरकार के अधिक नोट छापने पर देश की इकोनॉमी पर क्या असर पड़ता है।
नोट की छपाई को लेकर क्या है आदर्श स्थिति
कोई भी देश सामान्यत: जीडीपी के दो से तीन प्रतिशत के बराबर नोट छापता है। इस कारण अधिक नोट छापने के लिये जीडीपी को बढ़ाना जरूरी होता है और जीडीपी बढ़ाने के लिये विनिर्माण व सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि, व्यापार घाटे को कम करने आदि जैसे कारकों पर ध्यान होता है।
अधिक नोट छापने से चरम पर पहुंच सकती है महंगाई
जानी-मानी अर्थशास्त्री बृंदा जागीरदार से जब इस बाबत सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, ”हम इस बात को जिम्बाब्वे और वेनेजुएला में उपजी परिस्थितियों के जरिए आसानी से समझ सकते हैं। इन दोनों देशों की सरकारों ने कर्ज के निपटारे के लिए बड़े पैमाने पर नोट छापे। हालांकि, आर्थिक वृद्धि, सप्लाई और डिमांड के बीच सामंजस्य नहीं होने के कारण इन दोनों देशों में महंगाई आसमान पर पहुंच गई।”
उल्लेखनीय है कि अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे और दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए अधिक नोटों की प्रिंटिंग की। हालांकि, इन देशों ने नोटों की जितनी अधिक छपाई की, महंगाई उतनी अधिक बढ़ती गई और ये दोनों देश ‘Hyperinflation’ यानी बहुत अधिक महंगाई के दौर में पहुंच गए। वर्ष 2008 में जिम्बाब्वे में महंगाई दर में 231,000,000% की वृद्धि दर्ज की गई।
सामान्यतः कारगर नहीं है अधिक नोट छपाई का मॉडल
इसके पीछे की वजह यह है कि सरकार या केंद्रीय बैंक अगर अधिक नोट छापकर सबके हाथ में बांट देंगे तो सभी के पास पैसा हो जाएगा। दूसरी तरफ अगर सामान का उत्पादन थम गया है या आपूर्ति में दिक्कत है तो महंगाई का बढ़ना तय है। जागीरदार के मुताबिक वर्तमान परिस्थितियों में भी हालात ऐसे हैं कि औद्योगिक उत्पादन ठप है, आपूर्ति प्रभावित हुई है, अनिश्चितता के कारण डिमांड नहीं है, ऐसे में सरकार एक सीमा तक ही लोगों के हाथों में पैसे दे सकती है।
अधिक नोट छापने पर करेंसी के वैल्यू, सॉवरेन रेटिंग पर पड़ता है असर
जागीरदार ने कहा कि एक सीमा से अधिक नोटों की छपाई से देश के करेंसी की वैल्यू घटती है। साथ ही रेटिंग एजेंसियां भी देश की सॉवरेन रेटिंग घटा देती हैं। इससे सरकार को दूसरे देशों से कर्ज मिलने में दिक्कत होती है। इसके साथ ही सरकार को ऊंची दरों पर कर्ज मिलता है।
इस सिद्धांत को समझना भी है जरूरी
किसी भी देश को अमीर बनने के लिए अधिक-से-अधिक सामान के विनिर्माण एवं उत्पादन और बिक्री की जरूरत होती है। साथ ही सर्विस सेक्टर को भी मजबूत करना होता है। अधिक से अधिक सामान के उत्पादन की स्थिति में अधिक नोट छापना थोड़ा-बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री कहते हैं कि आर्थिक वृद्धि को मजबूती देने के लिए थोड़े पैमाने पर रुपये की छपाई मददगार साबित हो सकती है लेकिन उसकी एक सीमा है।
वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के समय डिमांड को मजबूती देने के लिए लगभग सभी देश के केंद्रीय बैंकों ने थोड़े अधिक रुपयों की प्रिंटिग की थी। इससे डिमांड को फिर से शुरू करने में मदद मिली थी। इसी आर्थिक संकट के समय ‘क्वांटिटेटिव इजींग’ (Quantitative Easing) शब्द मुख्यधारा में आया। इसका अर्थ लोगों के हाथों में अधिक पैसे पहुंचाने के लिये नोटों की छपाई बढ़ाने से है। हालांकि तब यह भी देखने को मिला था जिन भी देशों ने क्वांटिटेटिव इजींग का सहारा लिया, वहां महंगाई बढ़ने के साथ ही मुद्रा(करंसी) का अवमूल्यन भी हुआ। अत: कह सकते हैं कि नोटों की छपाई बढ़ाने के लाभ से अधिक नुकसान हैं।

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