चाण्क्य नीति में सच्चा दोस्त कौन.

मनुष्य के जीवन में मित्र को रिश्तेदारों से भी करीबी माना जाता है और अगर मित्र ही आपका नुकसान पहुंचाने की मंशा रखता हो तो वो दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है. ऐसे में सच्चे मित्र की पहचान कैसे की जाए, इसे लेकर आचार्य चाणक्य ने अपने नीति ग्रंथ (चाणक्य नीति) में कई नीतियों का उल्लेख किया है…

  1. चाणक्य कहते हैं कि सामने से प्रशंसा और आपके पीछे बुराई करने वाले मित्र का भूलकर भी साथ नहीं देना चाहिए. ऐसे मित्र सामने से मधुर व्यवहार करते हैं और आपको खुश करने की कोशिश करते हैं. लेकिन जैसे ही इन्हें मौका मिलता है ऐसे मित्र आपको नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे मित्र दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं.
  2. दोस्त पर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही उससे अपनी गुप्त या राज की बातों को बताना चाहिए. क्योंकि जब आपके रिश्ते में खटास आती है तो ऐसे मित्र आपके राज का सबसे सामने खुलासा कर सकते हैं.
  3. चाणक्य के मुताबिक दोस्त हमेशा अपने बराबर के लोगों को बनाना चाहिए. ऐसा नहीं करने पर रिश्तों के खराब होने की संभावना बढ़ जाती है. गरीब का कोई दोस्त नहीं होता वहीं, अमीर के आस पास दोस्तों की टोली होती है. ऐसी अवस्था में धनवान खुश रहता है कि उसके काफी दोस्त हैं और उसके दोस्त इसलिए खुश होते हैं कि धनवान उनके काम में मदद करेगा. ऐसे लोगों की पहचान करके उनसे दूर रहना चाहिए.
  4. निस्वार्थ भाव से दुख के समय में जो व्यक्ति आपका साथ दे वही आपका सच्चा मित्र हो सकता है. अगर कोई मित्र संकट में, बीमारी में, दुश्मन के हमला करने पर, राज दरबार में और शमशान में आपके साथ खड़ा रहता है तो वो आपका सच्चा मित्र है. ऐसे ही समय में आप अपनी मित्रता को परख पाते हैं.
  5. विपरीत स्वभाव वाले लोगों में कभी भी मित्रता नहीं हो सकती. अगर रिश्ता दिखावे का होता है. क्योंकि सांप और नेवले की, बकरी और बाघ की, हाथी और चींटी की व शेरनी और कुत्ते की कभी दोस्ती नहीं हो सकती. इसी प्रकार सज्जन और दुर्जन में भी दोस्ती असंभव है.
  6. संगत का असर मनुष्य पर ज्यादा होता है फिर चाहे वो अच्छा हो या फिर बुरा. धीरे-धीरे ही सही लेकिन ज्यादा समय उनके साथ बिताने पर आपके दोस्तों वाले गुण आपके अंदर आने लगते हैं. इसलिए दोस्ती करते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि आपके दोस्तों की संगत आपके अनुकूल हो.
  7. स्वार्थ के लिए हुई दोस्ती, हमेशा दुश्मनी का कारण बनती है. इसलिए समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह हमेशा मित्रों के चयन से पहले उसे जांच परख ले तथा खूब सोच विचार कर ले क्योंकि एक बार यदि दोस्ती गाढ़ी हो गई तो उसके बाद उसके परिणाम और दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं.
  8. दोस्त ऐसा हो जो आपके स्वभाव से मेल खाए, संकट काल में, बीमारी में, अकाल में और कष्ट में आपके कदम से कदम मिलाकर चले. जैसे कृष्ण और सुदामा की, कृष्ण और अर्जुन की, विभीषण और राम की बताई जाती है. ऐसे में मित्र बनाते समय उसके गुण और दोष को जान लें.

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