GDA और SADA को विलय करने की तैयारी, बनेगा नया प्राधिकरण

ग्वालियर। शहर में विकास प्राधिकरण और विशेष क्षेत्र प्राधिकरण (साडा) को विलय करने की तैयारी की जा रही है. दोनों को मिलाकर नया प्राधिकरण बनाया जाएगा. सरकार ने इसके लिए स्थानीय अधिकारियों से नगर निगम सीमा क्षेत्र और साडा की भौगोलिक स्थिति, उपलब्ध सुविधाओं और प्रस्तावित योजना की जानकारी के साथ रिपोर्ट तलब की है. हालांकि विलय का प्रस्ताव 2 साल पहले लाया गया था. इस पर नगरीय एवं आवास विकास विभाग ने प्रस्ताव और रिपोर्ट तैयार करने का आदेश जारी किया है.

दोनों प्राधिकरणों के विलय के बाद एनसीआर के बड़े प्रोजेक्ट को शहर में लाना आसान होगा, ग्वालियर-चंबल से पानी लाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बोर्ड से लोन लेने के लिए 2 साल पहले ग्वालियर को एनसीआर में शामिल किया गया था.साडा का गठन 1992 में हुआ था. साडा ने ग्वालियर में तिघरा से पुरानी छावनी तक 30 हजार हेक्टेयर में आवासीय व्यवसायिक क्षेत्र विकसित करने का काम शुरू किया था, जिसमें 5 हजार से ज्यादा प्लाट और डुप्लेक्स बनाए गए थे, लेकिन यहां कोई नहीं बसा. इस पर कलेक्टर अनुराग चौधरी का कहना है कि साडा और जीडीए का विलय किया जायेगा, जिससे स्टाफिंग बेहतर हो जाएगी.

फ्लैट के नाम पर लाखों पचाने वाला बिल्डर अधोलिया फरार, प्राचार्य पत्नी परेशान

ग्वालियर।
ग्वालियर में फ्लैट और दुकान देने के नाम पर लाखों की रकम एडवांस लेकर एक शातिर ठग बिल्डर कुलदीप अधोलिया फरार हो गये है। पति के लाखों पचाने के बाद फरार होने से उनकी पत्नी जो कि हरिदर्शन स्कूल की प्राचार्या है वह परेशानी में आ गई है। हालांकि उन्होंने अपने सार्सिस से मामला निपटाने की कोशिश भी कीे, परंतु वह सभी नाकाम साबित हुये है।
जानकारी के अनुसार ए-38 गांधी नगर में रहने वाला कुलदीप अधोलिया एनके बिल्डर का संचालक है। इसने वर्ष 2012 में गांधी नगर में ही सड़क किनारे एक बहुमंजिला इमारत का निर्माण कराया था। इसके लिए उसने शहर के कई लोगों से फ्लैट और दुकान यहां देने के नाम पर बुकिंग कर अनुबंध किया और इसके एवज में लाखों की मोटी रकम एडवांस के नाम पर ले ली। जब इमारत बनकर तैयार हो गई तो कई लोगों की रजिस्ट्री नहीं की और न ही एडवांस रकम वापिस की। जब दबाब बनाया गया तो बिल्डर शहर से ही फरार हो गया है। इसके खिलाफ अब आधा दर्जन लोगों ने पड़ाव थाने में 420 में शिकायत दर्ज कराई है। न्यायालय ने उसके गिरफ्तारी वारंट भी जारी किये है। लेकिन फरार बिल्डर पुलिस पकड़ से दूर है। अगर न्यायालय में अधोलिया हाजिर नहीं होता है तो उसकी संपत्ति कुर्क कर फरियादियों को उनका पैसा चुकाया जायेगा। इधर बिल्डर अधोलिया की हरकत से उनकी पत्नी नमिता जो कि हरिदर्शन स्कूल की प्राचार्या है ने अपने पति द्वारा किये सौदोंको निपटाने की कोशिश भी कीे, किन्तु उनके प्रयास भी नाकाम साबित हुये है।

भिण्ड नगर पालिका की अध्यक्ष को पड़ा दिल का दौरा,निधन

भिण्ड । नगर पालिका भिण्ड की अध्यक्ष कलावती वीरेंद्र मिहोलिया का बीती रात असामयिक दुःखद निधन हो गया ।

बताया गया कि कुछ दिनों पहले ही उन्होंने जुड़बा बच्चो को जन्म दिया था । परिवार में खुशी का माहौल था कि अचानक बीती रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा । घबराहट होने पर उनके उपचार की कोशिश की गई लेकिन अचानक उनकी हृदय गति रुक गयी ।

श्रीमती कलावती के निधन से पूरा शहर शोक में डूब गया क्योंकि वे सहज,मिलनसार और सुशील महिला थी । सभी की मदद के लिए ततपर रहती थीं ।

Delhi Election: विकास से भटके, तो BJP से वोटर्स छिटके

42 फीसदी लोगों ने विकास पर फोकस न करने को बताया वजह
57 ने केंद्र के कार्य, तो 25 फीसदी ने मोदी के नाम पर दिया वोट

दिल्ली के विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर थी. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहे आंदोलन के बीच चुनाव प्रचार के दौरान भारत बनाम पाकिस्तान से लेकर हिंदू बनाम मुसलमान तक, जुबानी जंग ने सारी हदें तोड़ दीं. गृह मंत्री अमित शाह ने डोर टू डोर कैंपेन किया, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 240 सांसदों ने स्लम में चार दिन डेरा डालकर निम्न और मध्यम वर्ग को अपने पाले में करने का पुरजोर प्रयास भी. एग्जिट पोल के आए नतीजे कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं.

मतदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी 70 में से 59 से 68 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखती हुई नजर आ रही है. वहीं, 21 साल बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी का दंभ भर रही विरोधी भाजपा पूरा दमखम झोंकने के बावजूद महज 2 से 11 सीटों पर सिमटती दिख रही है. अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर दिल्ली में भाजपा से वोटर्स क्यों दूर हुए? एग्जिट पोल की मानें तो विकास के मुद्दे से भटकना भाजपा को भारी पड़ गया. विकास का मुद्दा छोड़ने के कारण वोटर्स भाजपा से छिटक गए.

इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल के मुताबिक 42 फीसदी लोगों ने भाजपा का समर्थन नहीं करने के पीछे विकास कार्यों पर फोकस नहीं करने को वजह बताया है. वहीं, 14 फीसदी लोगों का कहना है कि वे केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकार चाहते हैं. 13 फीसदी लोगों ने एमसीडी के साथ ही भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के खराब प्रदर्शन को पार्टी का समर्थन नहीं करने के पीछे वजह बताया है.

उच्च आय वर्ग के साथ ही ब्राम्हण, जाट और गुर्जर मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया है. फिर भी, पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान करने वालों में से 48 फीसदी वोटर्स आप के साथ चले गए. इनमें बड़ी संख्या निम्न और निम्न मध्य वर्ग के वोटरों की है. भाजपा को जिन मतदाताओं ने वोट दिया भी, उनमें से 57 फीसदी ने केंद्र सरकार के कार्य और 25 फीसदी ने मोदी के नाम पर वोट दिया.

सीएए, शाहीन बाग नहीं बन सके मुद्दा

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, राम मंदिर के साथ ही चुनाव प्रचार के दौरान तीन तलाक, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और शाहीन बाग को भी मुद्दा बनाने की कोशिशें हुईं. इन्हें महज दो फीसदी लोगों ने ही मुद्दा माना. राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर छह फीसदी लोगों ने मतदान किया.

क्या थी सैंपल सर्वे की साइज

इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया ने एग्जिट पोल के लिए दिल्ली की सभी 70 सीटों पर जाकर वोटर्स से बातचीत की. इस एग्जिट पोल का सैंपल साइज 14,011 था. इसमें 66 फीसदी पुरुष और 34 फीसदी महिलाएं हैं. एग्जिट पोल के दौरान जिनसे बात की गई, उनमें 16 फीसदी लोगों की उम्र 18-25 साल के बीच थी. वहीं 29 प्रतिशत लोग 26-35, 36 फीसदी 36-50 साल और 12 फीसदी लोग 51-60 साल की आयु के बीच के थे. 61 साल से ऊपर के लोगों की आयु सात फीसदी थी.

फर्जीवाड़ा रोकने के लिए सभी पास अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराएगी सेना

हिमाचल प्रदेश
भर्ती परीक्षाओं में फर्जीवाड़े को देखते हुए सेना हिमाचल में पहली बार लिखित परीक्षा पास कर चुके सभी अभ्यर्थियों के प्रमाण-पत्रों की शिक्षा बोर्डों से सत्यापन कराएगी। प्रमाण-पत्रों की जांच के तय शेड्यूल के दौरान सेना अभ्यर्थी से शिक्षा बोर्ड को सत्यापन के लिए ऑनलाइन आवेदन कराएगी। शिक्षा बोर्ड की यह रिपोर्ट सीधे सेना के ट्रेनिंग सेंटर में पहुंच जाएगी। सेना निदेशालय हिमाचल में हुई भर्ती में चयनित युवाओं के दसवीं और जमा दो कक्षा के मूल प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराने जा रहा है। अभ्यर्थियों को ऑनलाइन आवेदन करना होगा। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड सत्यापन का 600 रुपये शुल्क  वसूलेगा। अन्य बोर्ड अपनी तय फीस लेंगे। 

सेना भर्ती कार्यालय पालमपुर और मंडी ने चयनित 1817 युवाओं को मूल प्रमाण पत्रों की जांच के लिए अलग-अलग तिथियों को कार्यालय में बुलाया है। वहीं से ही डिमांड ड्रॉफ्ड बनाने के बाद ऑनलाइन आवेदन संबंधित शिक्षा बोर्ड को किए जाएंगे, ताकि मूल प्रमाण पत्र के फर्जी होने की शंका दूर की जा सके। सेना भर्ती कार्यालय मंडी और पालमपुर के तहत आने वाले मंडी, कुल्लू, लाहुल-स्पीति, कांगड़ा और चंबा के 1817 युवाओं ने सेना भर्ती की लिखित परीक्षा पास की है। उधर, सेना भर्ती अधिकारी पालमपुर कर्नल संदीप सीरोही ने कहा कि चयनित युवाओं के मूल प्रमाण पत्रों का सत्यापन संबंधित बोर्ड से किया जाएगा। जिस दिन मूल प्रमाण पत्र की जांच कार्यालय में होगी, उसी दिन सत्यापन के लिए ऑनलाइन आवेदन संबंधित शिक्षा बोर्ड को अभ्यर्थी की ओर से करवाया जाएगा।

नई तबादला नीति में शिक्षकों को बड़ा झटका, नहीं मिलेगा ये लाभ


हिमाचल प्रदेश
नई तबादला नीति में हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिक्षकों को बड़ा झटका दिया है। नई नीति में शिक्षकों को अनुबंध सेवाकाल का लाभ नहीं मिलेगा। नौकरी नियमित होने पर इन्हें दोबारा से दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में सेवाएं देनी होंगी।

अनुबंध पर नियुक्त शिक्षकों को तबादला नीति में शामिल नहीं किया गया है। अनुबंध पर नियुक्त अधिकांश शिक्षकों को उनकी पहली नियुक्त दूरदराज के क्षेत्रों में मिली है। ऐसे में नई तबादला नीति इन शिक्षकों के लिए नियमित होने पर भारी पड़ने वाली है।

हिमाचल में वर्तमान में हजारों शिक्षक अनुबंध पर नियुक्त हैं। साल में दो बार 31 मार्च और 30 सितंबर को तीन साल का सेवाकाल पूरा करने पर इन्हें नियमित किया जाता है।
अनुबंध काल के दौरान शिक्षकों के तबादले भी नहीं होते हैं। अनुबंध पर नियुक्त अधिकांश शिक्षकों को पहली नियुक्ति प्रदेश के दुर्गम, दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में दी जाती है। ऐसे में जब ये शिक्षक नियमित होंगे तो इन्हें दोबारा से इन्हीं क्षेत्रों में सेवाएं देनी पड़ेंगी।

अनुबंध सेवाकाल से नियमित होने पर तबादले तय करने के लिए फिलहाल नई नीति में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। भविष्य में इसको लेकर सरकार फैसले ले सकती है। लेकिन अभी अनुबंध पर नियुक्त शिक्षकों के लिए नई तबादला नीति में कोई राहत नहीं दी गई है।

प्रदेश में जल्द ही करीब चार हजार नए शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है। इन शिक्षकों को अब कई सालों तक दुर्गम, दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में सेवाएं देनी पड़ेंगी।

संसद से पारित कानून के खिलाफ सड़क पर उतरना, अराजकता बढ़ाने वाला रुख

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने दोनों सदनों में विपक्ष और खासकर कांग्रेस के आरोपों की जिस तरह धज्जियां उड़ाते हुए उसके दुष्प्रचार को बेनकाब किया उसके बाद कम से कम उन लोगों को तो वास्तविकता का आभास हो ही जाना चाहिए जो नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को लेकर अंदेशे से ग्रस्त हैं या फिर उसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने न केवल यह नए सिरे से साफ किया कि इस कानून से किसी भारतीय नागरिक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला, बल्कि यह भी बताया कि इसमें संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

नेहरू-लियाकत समझौते ने भी अपने-अपने अल्पसंख्यकों की चिंता करने की हामी भरी थी

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री के साथ अन्य अनेक नेताओं के उन बयानों का जिक्र किया जिनमें पूर्वी पाकिस्तान से परेशान होकर भारत में शरण लेने आए लोगों को राहत देने की जरूरत जताई गई थी। उन्होंने 1950 में असम के मुख्यमंत्री को लिखी गई नेहरू जी की उस चिट्ठी का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों और प्रवासियों में अंतर करना होगा। इसी के साथ उन्होंने नेहरू-लियाकत समझौते का भी उल्लेख किया, जिसमें दोनों देशों ने अपने-अपने यहां के अल्पसंख्यकों की चिंता करने की हामी भरी थी।

पाक ने समझौते का पालन नहीं किया और अल्पसंख्यक प्रताड़ित होकर भारत आते रहे

चूंकि पाकिस्तान ने इस समझौते का पालन नहीं किया इसलिए वहां के अल्पसंख्यक प्रताड़ित होकर भारत आते रहे। यह सिलसिला आज भी कायम है, लेकिन विपक्ष जानबूझकर इसकी अनदेखी करना पसंद कर रहा है। वह यह समझने को भी तैयार नहीं कि पाकिस्तान में दलितों के साथ किस तरह छल हुआ और उसके चलते वहां मंत्री रहे जोगेंद्र नाथ मंडल को किस तरह भारत आना पड़ा? पाकिस्तान में आज भी अल्पसंख्यक प्रताड़ित हो रहे हैं, लेकिन हमारे विपक्षी दल कुछ कहने को तैयार नहीं। आखिर क्यों?

कांग्रेस सीएए के प्रति अंध विरोध से ग्रस्त

कांग्रेस सीएए के प्रति किस तरह अंध विरोध से ग्रस्त है, इसका उदाहरण है उसके शासित राज्यों द्वारा इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जाना। यह संविधान विरोधी आचरण तब किया गया जब नागरिकता के मामले में राज्य सरकारों की कहीं कोई भूमिका नहीं। नागरिकता कानून संबंधी संशोधन विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा में व्यापक बहस हुई थी। इसमें सभी दलों ने भाग लिया था।

कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने ऐसा माहौल बना दिया कि सीएए मुसलमानों के खिलाफ है

संसद से पारित कानून के खिलाफ सड़क पर उतरने का कोई मतलब नहीं होता, लेकिन कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने यही करना शुरू कर दिया। इन दलों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है। कुछ गैर राजनीतिक संगठन भी इसी काम में लग गए। इसी के चलते धरने-प्रदर्शन भी आयोजित होने लगे।

दिल्ली में शाहीन बाग इलाके में चल रहा धरना एक नाकाबंदी है, लाखों लोग परेशान

दिल्ली में शाहीन बाग इलाके में चल रहा धरना तो एक नाकाबंदी है। इस धरने से लाखों लोग परेशान हो रहे हैं, लेकिन उसे समर्थन दे रहे विपक्षी दलों को इसकी परवाह नहीं। उनके इसी रवैये को देखते हुए प्रधानमंत्री ने यह कहा कि यदि संसद से पारित कानून के खिलाफ जनता को भड़काया जाएगा और हिंसा को आंदोलन का अधिकार मान लिया जाएगा तो लोकतंत्र का चलना मुश्किल होगा।

धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों को राहत देने के लिए बनाए गए कानून का विरोध हो रहा

कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि आखिर नेहरू को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ समझौता क्यों करना पड़ा? इसी तरह लाल बहादुर शास्त्री को यह क्यों कहना पड़ा कि पूर्वी पाकिस्तान के पीड़ित अल्पसंख्यकों को राहत देने के लिए कुछ उपाय किए जाने चाहिए? क्या इससे खराब बात और कोई हो सकती है कि 1964 में तो पड़ोसी देशों में हो रहे धार्मिक उत्पीड़न पर चिंता जताई गई, लेकिन आज ऐसा करने से न केवल बचा जा रहा है, बल्कि इस उत्पीड़न के शिकार लोगों को राहत देने के लिए बनाए गए कानून का विरोध हो रहा है।

मोदी सरकार ने वही काम किया जैसा मनमोहन चाह रहे थे

प्रधानमंत्री ने यह सही सवाल पूछा कि क्या नेहरू और शास्त्री ने ऐसे बयान इसलिए दिए, क्योंकि वे देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे? कम से कम कांग्रेस को यह तो स्मरण ही होगा कि मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में नेता विपक्ष के तौर पर बांग्लादेश जैसे देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को लेकर क्या मांग की थी? कायदे से उन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी इस मांग के अनुरूप कदम उठाने चाहिए थे, लेकिन उन्होंने दस साल तक कुछ नहीं किया। इससे भी हैरानी की बात यह है कि अब जब मोदी सरकार ने वही काम किया जैसा वह चाह रहे थे तो कांग्रेस विरोध कर रही है। यह तो एक तरह से खुद के खिलाफ खड़ा होना है।

पीएम मोदी ने संसद में कांग्रेस के दोहरे मानदंडों को किया बेनकाब

हालांकि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के दोहरे मानदंडों को बेनकाब करने में कोई कसर नहीं उठा रखी, लेकिन लगता नहीं कि उसके रवैये में कोई सुधार होगा। इसके भी आसार कम ही हैं, जो लोग सीएए के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं वे भी अपनी जिद छोड़ेंगे, क्योंकि उनका विरोध प्रायोजित है और उसका मकसद भी कुछ और है। शाहीन बाग और ऐसे ही जो धरने देश के अन्य हिस्सों में चल रहे हैं वे बिना किसी राजनीतिक छत्रछाया के चल ही नहीं सकते।

शाहीन बाग धरने को राजनीतिक दलों के साथ पीएफआइ का संरक्षण प्राप्त है

शाहीन बाग धरने को लेकर तो ऐसे प्रमाण भी सामने आ गए हैं कि उसे राजनीतिक दलों के साथ पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआइ जैसे कुछ संदिग्ध किस्म के संगठन समर्थन और पैसा दे रहे हैं। इस तरह के धरनों में मुस्लिम समाज के मुट्ठी भर लोग ही शामिल हैं, लेकिन देश को यह दिखाया जा रहा है कि उसमें हर वर्ग के लोगों की भागीदारी है। यह निराशाजनक है कि चंद लोगों का रुख पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए कठिनाई का कारण बन गया है।

विपक्षी दल सीएए विरोधी राजनीति पर इतना आगे बढ़ गए कि वहां से लौटना मुश्किल

विपक्षी दल सीएए विरोधी राजनीति पर इतना आगे बढ़ गए हैं कि उन्हें वापस लौटना मुश्किल हो सकता है। वे इस कानून के साथ ही एनपीआर को लेकर भी अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। ऐसा करके वे एक तरह से अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। कुछ समय बाद उनके लिए जनता को यह समझाना मुश्किल होगा कि वे सीएए और एनपीआर पर जो कुछ कह रहे थे उसका आधार और औचित्य क्या था? उन्हें यह बताने में भी मुश्किल होगी कि वे संसद से पारित कानून का विरोध कैसे कर सकते हैं?

प्रधानमंत्री मोदी के बार-बार स्पष्टीकरण के बाद भी मुसलमान समझने को तैयार नहीं

विपक्षी दलों न सही मीडिया के उन लोगों को तो यह समझ आना ही चाहिए कि वे सीएए पर लोगों को गुमराह कर एक तरह से आग लगाने का काम कर रहे हैं। जहां तक उन मुसलमानों की बात है जो प्रधानमंत्री के बार-बार के स्पष्टीकरण के बाद भी समझने को तैयार नहीं तो इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि वे गैर-कानूनी तरीके से देश में आ गए लोगों के हितैषी बन रहे हैं? समाज का कोई भी वर्ग हो, उसे सबसे पहले देश की चिंता करनी होगी और उसके बाद जाति-मजहब और समुदाय की।

दिल्ली चुनाव परिणाम के बाद होंगे मप्र भाजपा के रुके फैसले

भोपाल BJP दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद मप्र भाजपा के कई रुके फैसलों को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू होगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होने के बावजूद मप्र में अध्यक्ष का फैसला अब तक नहीं हो पाया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अब संसदीय बोर्ड की सहमति से प्रदेश का मनोनयन करेंगे। इसके बाद ही प्रदेश के 33 जिलों में जिलाध्यक्षों का मनोनयन हो पाएगा। साथ ही कुछ दिनों में प्रदेश से खाली होने वाली दो राज्यसभा सीटों पर भी पार्टी को प्रत्याशी तलाशना है। प्रभात झा जहां एक और कार्यकाल पाने के प्रयास में हैं, वहीं सत्यनारायण जटिया का पुनर्वास करने पार्टी में अन्य विकल्प तलाशे जा रहे हैं।
बताया जाता है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का अब मनोनयन होगा। पार्टी के संगठन चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाने के कारण राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा संसदीय बोर्ड की सहमति से प्रदेशाध्यक्ष का नाम घोषित करेंगे। इससे पहले प्रदेशाध्यक्ष को लेकर पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव राम माधव और विजय सोनकर शास्त्री से रायशुमारी करवाकर आम सहमति बनाने का प्रयास भी किया, लेकिन एक नाम पर निर्णय नहीं हो पाया। यही हाल जिलों के चुनाव का रहा। रायशुमारी के आधार पर ही पार्टी ने 33 जिलों के अध्यक्ष भी नियुक्त किए हैं। मध्य प्रदेश भाजपा में संगठनात्मक जिलों की संख्या 57 है। जहां सहमति नहीं बन पाई, उन 24 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति रोक दी गई।
राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव
राज्यसभा के लिए मध्य प्रदेश से रिक्त हो रही तीन सीटों के चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। प्रदेश में 9 अप्रैल 2020 को तीन राज्यसभा सदस्यों पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रभात झा और सत्यनारायण जटिया का कार्यकाल पूरा हो रहा है। तीन राज्यसभा सदस्यों के चुनाव में एक प्रत्याशी को जीत के लिए कम से कम 58 विधायकों के वोटों की जरूरत होगी। कांग्रेस के पास अभी 114 विधायक हैं, लेकिन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के मंत्रिमंडल में एक निर्दलीय विधायक है। तीन निर्दलीय कांग्रेस विचारधारा के हैं और सरकार को समर्थन भी दे रहे हैं। इसी तरह बसपा के दो और सपा का एक विधायक भी कमलनाथ सरकार को समर्थन कर रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के पास 120 विधायकों का समर्थन है। वहीं, भाजपा के 107 विधायक हैं। ऐसे में कांग्रेस के दो प्रत्याशियों की राज्यसभा चुनाव में जीत आसान है। 230 सदस्यों वाली विधानसभा में अभी 228 सदस्य हैं।
इनका कहना है
सीएए सहित दिल्ली विधानसभा चुनाव की व्यस्तता के कारण प्रदेशाध्यक्ष का फैसला टाल दिया गया था। सारा मामला हाईकमान के संज्ञान में है। संगठन की रीति-नीति के हिसाब से सारे निर्णय जल्द ही लिए जाएंगे।
रजनीश अग्रवाल, प्रवक्ता, भाजपा मप्र

1 अप्रैल से देश में बंद हो जाएगी BS 4 इंजन वाली कारों की विक़ी.

ग्वालियर एक अप्रैल से केवल बीएस-6 वाहनों की बिक्री और रजिस्टे्रशन के कारण ग्राहकों ने इनकी बुकिंग शुरू कर दी है। कई ऑटोमोबाइल कंपनियों ने अपने नए मॉडल इसी तकनीक के साथ बाजार में उतार दिए हैं। इनकी लॉन्चिंग भी शहर में स्थित शोरूम में होने लगी है। दूसरी तरफ बीएस-4 इंजन वाले वाहनों को 31 मार्च तक बेचा जा सकेगा। इसलिए एजेंसियां अपना स्टॉक क्लीयर कर रही हैं।
1 अप्रैल से बंद हो जाएगी बीएस-4 इंजन वाले वाहनों की बिक्री
अब बीएस-6 तकनीक वाली कार और मोटर साइकिल का जमाना, बढ़ी बुकिंग
मोटरसाइकल-स्कूटर निर्माता कंपनियों ने बीएस-4 इंजन वाले वाहनों पर ऑफर देना शुरू कर दिया है। इसका सकारात्मक असर बिक्री पर पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वाहन निर्माता कंपनियां अब केवल बीएस-6 इंजन वाले वाहनों की बिक्री एवं रजिस्टे्रशन करवा सकेंगी। जानकारों का कहना है कि बीएस-4 मानक वाले इंजन पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि इस प्रकार के ईंधन से चलने वाले वाहनों से प्रदूषण अपेक्षाकृत ज्यादा फैलता है। इस ईंधन में सल्फर की मात्रा अधिक होती है। इससे वायु में नाइट्रोजन आक्साइड का उत्सर्जन ज्यादा होता है। यह वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण भी है। दूसरी तरफ बीएस-6 तकनीक वाले वाहनों के इंजन में एडवांस एमीशन कंट्रोल सिस्टम फिट किया गया है। इस कारण नाइट्रोजन आक्साइड का उत्सर्जन कम होगा।

सडक़ों पर आए नए वाहन, कीमत ज्यादा
शहर में आधा सैकड़ा से ज्यादा कार एवं मोटर साइकल की एजेंसियां हैं। यदि मोटरसाइकल और स्कूटर की बात की जाए तो प्रतिदिन करीब 160 वाहन बिक जाते हैं। इसी प्रकार कार की सभी श्रेणियों में 40 से 50 कारों का विक्रय प्रतिदिन होता है। अभी इनकी बिक्री में तेजी आई है। क्योंकि बीएस-6 वाहन में नई तकनीक के कारण उसकी कीमत भी ज्यादा होगी। दो पहिया वाहन 12 से 18 फीसदी तक महंगे हो सकते हैं। वहीं कार की कीमत में 12 हजार से लेकर 30 हजार तक की बढ़ोतरी अनुमान है। ऐसे में ग्राहक भी बीएस-4 तकनीक वाहन खरीद रहे हैं। मानकों के अनुसार तय समय सीमा तक इन्हें सडक़ों पर दौड़ाया जा सकता है। इसी प्रकार बीएस-6 वाहन भी कुछ कंपनियां बनाने लगी है। इसलिए शहर की सडक़ों पर यह वाहन भी दौड़ रहे हैं।
पेट्रोलियम कंपनियों की तैयारियां नहीं
वाहनों के साथ पेट्रोलियम कंपनियों को भी बीएस-6 वाहनों के लिहाज से पेट्रोल और डीजल की व्यवस्था पेट्रोल पंपों पर करना है। अभी इस दिशा में किसी कंपनी के द्वारा कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह होगा कि गाडिय़ां बीएस-6 की होंगी लेकिन उन्हें ईंधन हाइग्रेड या बीएस-4 वाला ही डालना पडेग़ा।

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