राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर कमलनाथ सरकार में सुगबुगाहट.

भोपाल कमलनाथ सरकार द्वारा सरकारी संस्थाओं में अशासकीय पदों पर नियुक्तियों को लेकर अब जल्द ही फैसले के आसार दिखाई दे रहे हैं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ अखिल अभा कांग्रेस कमेटी के महासचिव व प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया की मुलाकात में हाईकमान की मंशा के अनुरूप नियुक्तियों पर फैसला लिए जाने की संभावना है। संभवत: विधानसभा की विशेष बैठकों के बाद राजनीतिक नियुक्तियां कर दी जाएंगी। सूत्रों से यह भी संकेत मिले हैं जिन लोगों को पार्टी ने लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में टिकट दिया था, उनकी नियुक्तियों को फिलहाल टाला जाए। हालांकि इनमें कुछ दिग्गज नेताओं को अपवाद स्वरूप शामिल किया जा सकता है। कांग्रेस की सत्ता में 15 साल बाद वापसी और डेढ़ दशक के लंबे संघर्ष के बाद पार्टी से उम्मीद लगाए बैठे नेताओं को सरकार जल्द ही नए साल का उपहार दे सकती है। इसमें पार्टी की गुटीय राजनीति, क्षेत्रीय व जातीय समीकरणों के संतुलन को बनाने की कोशिश की जा रही है।
मंत्रिमंडल के गठन में गुटीय संतुलन में क्षेत्रीय व जातीय संतुलन गड़बड़ाने से कुछ नाराजगी दिखाई दी है। इस बारे में कांग्रेस महासचिव बाबरिया को भी दौरों तथा भोपाल में मुलाकातों में क्षेत्रीय व जातीय प्रतिनिधि मंडलों ने शिकायतें भी की हैं, जिनको लेकर वे कई बार अपने बयानों में कह भी चुके हैं।
बाबरिया ने की सीएम से मुलाकात : कांग्रेस महासचिव दीपक बाबरिया ने कुछ नियुक्तियों को लेकर सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी जताई है और वे एआईसीसी-पीसीसी के बीच तालमेल की कमी के बारे में बयान भी दे चुके हैं। इसके बाद ही बाबरिया ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की थी। सूत्रों के मुताबिक राजनीतिक नियुक्तियों पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हुई। सरकार 16-17 जनवरी को आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन कानून विधेयक के अनुसमर्थन को लेकर आयोजित विस की विशेष बैठकों के बाद राजनीतिक नियुक्तियों पर विचार करेगी।
सहकारिता क्षेत्र से शुरुआत संभव : माना जा रहा है कि फिलहाल सहकारिता क्षेत्र में कांग्रेस अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए पार्टी के सहकारिता में सक्रिय नेताओं की नियुक्ति पहले कर सकती है। इसमें प्रदेश की करीब दर्जनभर सहकारी संस्थाओं तथा जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों में इनकी नियुक्ति प्रशासक के रूप में की जा सकती है।
सरकार में अभी ऐसा है असंतुलन
राज्य के 52 जिलों में से 20 जिलों का सरकार में प्रतिनिधित्व है।
ग्वालियर, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, खरगोन, सागर, धार, गुना जिलों के तो दो लेकर तीन तक मंत्री हैं।
ग्वालियर के ही तीन मंत्री हैं, जबकि इससे बड़े भोपाल, इंदौर व जबलपुर के दो-दो मंत्री ही हैं।
धार-गुना और सागर जैसे जिलों के भी दो-दो मंत्री हैं।
ग्वालियर-चंबल तथा भोपाल- होशंगाबाद के 11 मंत्रियों की संख्या से अन्य क्षेत्रों के असंतुलन की स्थिति बन गई है।
महाकोशल के चार मंत्री बनाए गए हैं, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को मिलाकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व आधा दर्जन हो गया है।
*ये जिले वंचित : छतरपुर, पन्ना, सतना, विदिशा, रतलाम, झाबुआ, खंडवा और उज्जैन से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया है।

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