तीन तलाक कानून के खिलाफ याचिका: कानून की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट, केंद्र को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली: तीन तलाक कानून के खिलाफ दाखिल याचिका सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक कानून की समीक्षा करने को तैयार हो गया है. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई धार्मिक प्रथा (जैसे दहेज़/सती) को गलत या अपराध करार दिया हो ऐसे में क्या इसे अपराध की सूची में नहीं रखेंगे. तीन तलाक कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में तीन याचिकाएं दाखिल की गई थीं. 

उलेमा-ए-हिंद के मुताबिक तीन तलाक कानून का एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम पतियों को दंडित करना है. ये भी कहा गया है कि मुस्लिम पतियों के साथ अन्याय है. जबकि हिंदु समुदाय या अन्य में ऐसा प्रावधान नहीं है.  इसके अलावा समस्त केरल जमीयतुल उलेमा व अन्य ने भी इस कानून के  खिलाफ याचिका दाखिल की है. याचिका में कहा गया कि कानून से मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. वहीं तीसरी याचिका आमिर रशादी मदनी ने दाखिल की है. 

बता दें, तीन तलाक भारत में अपराध है. इसके तहत तीन तलाक को गैर कानूनी बनाते हुए 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान शामिल है. अगर मौखिक, लिखित या किसी अन्य माध्यम से पति अगर एक बार में अपनी पत्नी को तीन तलाक देता है तो वह अपराध की श्रेणी में आएगा. तीन तलाक देने पर पत्नी स्वयं या उसके करीबी रिश्तेदार ही इस बारे में केस दर्ज करा सकेंगे. पुलिस बिना वारंट के तीन तलाक देने वाले आरोपी पति को गिरफ्तार कर सकती है. एक समय में तीन तलाक देने पर पति को तीन साल तक कैद और जुर्माना दोनों हो सकता है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से ही उसे जमानत मिलेगी.

मजिस्ट्रेट बिना पीड़ित महिला का पक्ष सुने बगैर तीन तलाक देने वाले पति को जमानत नहीं दे पाएंगे. तीन तलाक देने पर पत्नी और बच्चे के भरण पोषण का खर्च मजिस्ट्रेट तय करेंगे, जो पति को देना होगा. तीन तलाक पर बने कानून में छोटे बच्चों की निगरानी और रखावाली मां के पास रहेगी. नए कानून में समझौते के विकल्प को भी रखा गया है.

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