कश्मीर पर पाकिस्तान चाहकर भी नहीं खेल सकता अपना आखिरी दांव

मोदी सरकार के जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकारों से जुड़े अनुच्छेद 370 में बदलाव के फैसले के बाद से ही पाकिस्तान अपना हर दांव आजमा रहा है. भारत के साथ कूटनीतिक संबंधों में कमी और व्यापारिक संबंध खत्म करने के आत्मघाती फैसले के बाद पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी मुद्दा उठाने की कोशिश की पर नाकाम रहा. तुर्की और चीन के अलावा, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को किसी भी देश का समर्थन नहीं मिला. ऐसे में पाकिस्तान के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह हर बार की तरह जिहादी हथियार का इस्तेमाल करे.

सोमवार को पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक एक टीवी शो के दौरान खुले आम कश्मीर मुद्दे पर आतंकवाद का समर्थन करते नजर आए. पाकिस्तान के पूर्व राजदूत अशरफ जहांगीर काजी और अब्दुल बासित ने पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर के टीवी शो में कहा कि कश्मीर के लिए सशस्त्र संघर्ष वैध है. यहां तक कि उन्होंने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग देने की भी अपील की.

काजी ने कहा, “भारत एक ताकतवर देश हैं और केवल कूटनीति से पाकिस्तान को अपेक्षित नतीजे नहीं मिलने वाले हैं. जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए यह वैध है कि वे सशस्त्र प्रतिरोध करें या हाथ में बंदूक उठाएं. अगर वे अपने इस वैध जिहाद के लिए दूसरे देशों से मदद मांगते हैं तो उसमें भी कुछ गलत नहीं होगा.

भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रह चुके अब्दुल बासित ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा, जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर कूटनीति की एक सीमा है. अगर कश्मीरी अपनी जान गंवा रहे हैं तो एक स्थिति आएगी जब हमें अहम कार्रवाई करनी होगी. अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भी दूसरे देशों की जिम्मेदारी है कि वे कश्मीरियों के संघर्ष में उनकी मदद करें.

पश्चिमी देशों के विश्लेषकों का कहना है कि भारत के अनुच्छेद-370 पर फैसले के बाद से पाकिस्तान जिहादी ढांचे को ध्वस्त करने के अपने पहले गंभीर प्रयास को रोक सकता है. हालांकि, इस्लामाबाद ऐसा कोई कदम उठाता है तो इससे उसके लिए ही मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

पिछले दिनों जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से कश्मीर में जिहाद के विकल्प का इस्तेमाल करने के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इससे फायदे से ज्यादा नुकसान ही होगा. इमरान खान ने कहा कि जिहाद जमीनी स्तर पर कोई विकल्प नहीं है. इमरान ने यह भी आरोप लगाया था कि भारत दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पुलवामा हमले के बाद की तरह किसी फर्जी ऑपरेशन को भी अंजाम दे सकता है.

हालांकि, इमरान खान की सरकार के ऊपर घरेलू दबाव है और विपक्षी दल कश्मीर पर कदम उठाने की मांग कर रहे हैं. पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने भी अपने बयान में कहा कि सेना कश्मीरियों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं हालांकि, वह साफ-साफ नहीं बता सके कि वह क्या करने की स्थिति में हैं. दूसरी तरफ, कई नेता-राजदूत लगातार जिहाद की रट लगा रहे हैं.

पाकिस्तान की सेना ने 1990 में कश्मीर में छद्मयुद्ध छेड़ने के लिए जिहादी संगठनों को तैयार किया. अमेरिका व अन्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के बावजूद पाकिस्तान इन आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई का केवल दिखावा करता रहा और उन्हें खुले आम अपनी जमीन पर फलने-फूलने दिया. स्थानीय और विदेशी अधिकारियों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान ने मजबूरी में आतंकी संगठनों की संपत्ति जब्त करने, कुछ ट्रेनिंग कैंपों और उनके कुछ प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार कर खुद को आर्थिक प्रतिबंधों से बचाने की कोशिश की है.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान फिलहाल कश्मीर पर आतंकी समूहों को आगे करने का जोखिम नहीं लेगा. खासकर, जब इसी साल पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में भारतीय वायुसेना ने आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई कर संदेश दे दिया कि वह ऐसे बड़े कदम उठा सकता है. पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व का एक धड़ा भी यह बात मानता है कि जिहाद की वजह से उन पर सीमा-पार आतंकवाद फैलाने का ठप्पा लगा है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर पर उनकी स्थिति कमजोर हुई है. अगर पाकिस्तान जिहादी संगठनों को नहीं रोक पाता है तो इससे उसके लिए ही मुश्किलें बढ़ेंगी क्योंकि इससे वैश्विक मंचों पर पहले ही आतंकवाद को लेकर छवि बेहद खराब है.

अक्टूबर महीने में, अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स यह फैसला करेगी कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने में नाकाम रहने पर उत्तर कोरिया और ईरान के साथ ब्लैकलिस्ट में डाला जाए या नहीं. अगर अंतरराष्ट्रीय संस्था पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में डालती है तो उसकी पहले से ही बदहाल अर्थव्यवस्था वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से बिल्कुल कट जाएगी. इसके अलावा, पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मई में स्वीकृत हुए 6 अरब डॉलर के रेस्क्यू पैकेज पर भी खतरा मंडराएगा. यही नहीं, पाकिस्तान की अर्थव्यव्यवस्था की क्रेडिट खराब होने से निवेश भी गिर जाएगा.

इस्लामाबाद आधारित विश्लेषक शहरयार फजली ने कहा कि पाकिस्तान इस उम्मीद में है कि अफगानिस्तान शांति वार्ता में अमेरिका की मदद के बदले वॉशिंगटन उसे ब्लैकलिस्ट होने से बचाने में मदद करेगा. 

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