बिहार में RJD ने फेंका पासा, क्या नीतीश कुमार फिर बनेंगे विपक्ष का चेहरा?

आरजेडी (RJD) चाहती है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश के सभी विपक्षी दलों के बीच सर्वस्वीकार्य नेता के अभाव में समाजवादी जमात का नेतृत्व करें. जेल में बंद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साथ मुलाकात कर राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने हाल ही में नीतीश को आगे लाने और विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए साफ संकेत दिए हैं. शिवानंद तिवारी ने कहा कि जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ बिहार और केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होकर ऐतिहासिक गलती की है.

राजद नेता चाहते हैं कि नीतीश विपक्ष का नेतृत्व करें

राजद नेता शिवानंद तिवारी (Shivanand Tiwari) ने कहा, ‘चूंकि इन दिनों केंद्र में कोई विश्वसनीय विपक्ष नहीं है, इसलिए नीतीश कुमार को राष्ट्रीय राजनीति में आना चाहिए और सभी विपक्षी दलों को एकजुट करना चाहिए क्योंकि उन्होंने अभी तक अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखा है’.

तिवारी ने आगे कहा, ‘राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेतृत्व शून्य है. मैंने लगभग 35 वर्षों तक नीतीश कुमार को राजनीति में देखा है और मैं ये दावा कर सकता हूं कि उनके पास देश का प्रधानमंत्री बनने की राजनीतिक हिम्मत और क्षमता है. उन्हें एनडीए के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा बनना चाहिए.’

नीतीश को मांझी का भी है समर्थन

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाले हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) ने भी नीतीश कुमार को एनडीए से बाहर निकलने और वैकल्पिक मंच पर काम करने की सलाह दी है. मांझी ने कहा, “ये खास वक्त है कि सभी समान विचारधारा वाले नेता आगे आएं और वर्तमान स्थिति में एक बेहतर विकल्प दें.”

इसे 2020 के विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Elections 2020) से पहले एक बार फिर राजद के साथ हाथ मिलाने के लिए जदयू प्रमुख को एक खुला निमंत्रण माना जा रहा है. नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनावों में राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी.

तेजस्वी यादव की कम सक्रियता भी है एक वजह

पार्टी नेता तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Yadav) की राजनीति से कथित नाराजगी और पार्टी के साथ-साथ विपक्ष का नेतृत्व करने को लेकर उनकी की कमी की वजह से राजद ऐसी संभावनाओं पर विचार कर रहा है. तेजस्वी ने लालू यादव सहित अपने परिवार के सदस्यों को अपनी भावनाओं से अवगत कराया कि अगर वो पार्टी का नेतृत्व करते हैं तो वो अपनी बड़ी बहन मीसा भारती और बड़े भाई तेजप्रताप यादव के दखल को स्वीकार नहीं करेंगे.

तेजस्वी चाहते हैं नए सिरे से शुरुआत

तेजस्वी शेल कंपनियों और आईआरसीटीसी घोटाले के मामलों के कानूनी दांवपेंच से छुटकारा पाना चाहते हैं. वो राजनीति में नए सिरे से शुरुआत करने से पहले इन मामलों से निपटना चाहते हैं. ऐसी अटकलें लगाई जाती रही हैं कि तेजस्वी ने अपने खिलाफ दर्ज मामलों में कुछ राहत पाने के लिए जानबूझकर एनडीए पर हमले कम कर दिए हैं. राजद के वरिष्ठ नेता भी लालू के झांसे में आने से बच रहे हैं. उनमें से कुछ ने पार्टी को चलाने के लिए नए कार्यकारी अध्यक्ष की भी मांग की है, ताकि सहयोगी दलों के साथ लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में राजनीतिक हालात पर बात की जा सके, और भविष्य में नए योजनाओं को अंजाम दिया जा सके.

कई मुद्दों पर जेडीयू का बीजेपी से अगल स्टैंड भी रहा है

इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि अगले साल कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले मुख्य नायक के रूप में नीतीश कुमार के साथ विपक्षी खेमा एक मंच पर आने की तैयारी कर रहा है. जेडीयू ने पहले ही संसद के दोनों सदनों में ट्रिपल तलाक विधेयक और अनुच्छेद 370 का विरोध किया है. पार्टी के पास समान नागरिक संहिता और राम मंदिर को लेकर समान रूप से विपरीत रुख है और वह चाहती है कि दोनों मुद्दों को या तो अदालत के फैसले या आम सहमति से सुलझाया जाए.

नीतीश जेडीयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाना चाहते हैं

हालांकि केंद्र और बिहार में जेडीयू एनडीए का हिस्सा है, लेकिन उसने संसदीय और विधानसभा चुनावों में मतदान के लिए चार राज्यों दिल्ली, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में अलग से चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जिससे 2020 तक एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया जा सके. इस समय जेडीयू बिहार और अरुणाचल प्रदेश में एक मान्यता प्राप्त पार्टी है. एक प्रभावशाली राजनेता के तौर पर नीतीश कुमार ने बिहार से बाहर भी अपनी पहुंच का विस्तार करने की कवायद शुरू कर दी है. कम से कम हिंदी हार्टलैंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों में तो वो अपनी पहुंच बनाना ही चाहते हैं. वो इस समय क्षेत्रीय नेताओं जैसे अखिलेश यादव, मायावती, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से बड़ी रेखा खींचने की कोशिश कर रहे हैं.

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