अनुच्छेद 370 खत्म होने पर बौखलाया पाकिस्तान, भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ा

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के फैसले से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान लगातार बैठकें कर रहे हैं. इसी सिलसिले में आज उन्होंने नेशनल सेक्योरिटी कमेटी की बैठक की. इस बैठक में पाकिस्तान ने भारत के साथ अपने कूटनीतिक संबंध का दर्जा घटाने का फैसला किया. साथ ही भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध भी संस्पेंड करने का फैसला किया. यही नहीं पाकिस्तान ने कहा है कि वह द्विपक्षीय समझौतों की समीक्षा करेंगे.

आपको बता दें कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में बांट दिया है. साथ ही जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष दर्जे को भी खत्म किया है.

नशा कारोबारियों तक पुलिस पहुंचने में नाकामयाब

शिवपुरी

शहर नशे के कारोबार की जकड़ में फसता ही चला जा रहा है भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस बारे में ज्ञापन प्रशासन पुलिस प्रशासन को काफी समय पहले दिया था किंतु नशे कारोबारी तक पहुंचने में पुलिस नाकामयाब रही है। कार्यवाही के नाम पर केवल नशा करने वाले व्यक्ति ही पुलिस ने पकड़े हैं। नशे के मेन कारोबारी तक पहुंचने में पुलिस नाकामयाब है, जबकि पिछले दिनों एक कार का पीछा पुलिस प्रशासन ने किया था जो नशे के कारोबारी थे ।वह कार से निकलकर गलियों में भाग गए। पुलिस ने उक्त कार्य को जब्त भी कर लिया था किंतु अपराधियों तक पहुंचने में पुलिस कामयाब नहीं हो सकी । अपराधियों के फोटो गलियों के सीसीटीवी कैमरे में मौजूद हैं सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी पुलिस के पास है किंतु राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस उक्त नशे के कारोबारियों तक पहुंचने में अभी तक असफल है।

इस घटना को लेकर व नशे के कारोबार को लेकर शिवपुरी की जनता बहुत भयभीत है ,वह तरह तरह के प्रश्न चिन्ह पुलिस प्रशासन पर लगा रही है । गुना शिवपुरी के सांसद के पी यादव बी लोकसभा में शिवपुरी शहर को नशे की गिरफ्त के बारे में प्रश्न संसद में उठा चुके हैं इसके बावजूद पुलिस के हाथ खाली हैं । यह विचारणीय प्रश्न है पुलिस का कोई भी आला अधिकारी बताने की स्थिति में नहीं है की शिवपुरी शहर नशे के कारोबार से कब मुक्त होगा ; यह कोई नहीं जानता।

युवा वर्ग नशे के मकड़जाल में उड़ता चला जा रहा है। युवाओं के परिवार आर्थिक व मानसिक रूप से लगातार दलदल में फंसते चले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ जी से अनुरोध है कि वह शिवपुरी शहर की कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करें जिससे युवा वर्ग नशे की महामारी से बच सके व परिवार सुकून की जिंदगी जी सकें।
शिवपुरी से करुणेश शर्मा
द न्यूज़ लाइट संपादक शिवपुरी

बारिश के चलते अंबोडाला के नजदीक मालगाड़ी के 3 डिब्बे पटरी से उतरे

भुवनेश्वर। ओडिशा में भारी बारिश के चलते आज मालगाड़ी के तीन डिब्बे पटरी से उतर गए। बताया जा रहा है कि ये घटना रायगाडा और तितिलागढ़ के बीच अंबोडाला रेलवे स्टेशन के नजदीक घटी। मालगाड़ी के डिब्बे बेपटरी होने की वजह से ट्रेनों का संचालन भी प्रभावित हुआ। वहीं इस हादसे के बाद मौके पर एक्सीडेंट रिलीफ टीम को भेजा गया है। जानकारी के मुताबिक इलाके में भारी बारिश के चलते रेलवे ट्रेक प्रभावित हुआ है, इस वजह से ये हादसा हुआ है।

देशभर में इन दिनों कई राज्य भारी बारिश के प्रकोप को झेल रहे हैं। असम, बिहार के साथ ही महाराष्ट्र में भी भारी बारिश हो रही है, इसके चलते जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। कई राज्यों में भूस्खलन की घटनाएं भी सामने आई हैं, जिस वजह से लोगों की मुश्किलें और बढ़ने लगी हैं।

टिहरी में स्कूल बस खाई में गिरी, 9 बच्चों की मौत

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में एक स्कूली बस खाई में गिर गई है. टिहरी के कांगसाली में मंगलवार को हुए इस हादसे में 9 बच्चों की मौत हो गई है. स्कूल की मिनी बस में 18 बच्चे सवार थे. एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंच गई है और राहत व बचाव कार्य चलाया जा रहा है.घायलों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है. हादसा टिहरी गढ़वाल के लबगांव के कनसाली में हुआ था. सभी बच्चे मिनी बस में सवार थे. घटनास्थल पर पुलिस भी पहुंची है.

पहले सत्र में मोदी सरकार ने बनाया इतिहास, मुश्किल विधेयक भी चुटकियों में हुए पास

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में संसद के दोनों सदनों की हर बड़ी बाधा को बेहद आसानी से पार कर लिया। जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने वाले जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक विधेयक जैसे मुश्किल विधेयक को न केवल संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिली, वहीं सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक और तीन तलाक बिल को पारित कराने में सरकार के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। विपक्ष जहां बिखरा नजर आया, वहीं सरकार का आत्मविश्वास अपनी बुलंदियों को छूता रहा। खास बात यह रही कि छह अगस्त की शाम तक लोकसभा ने जहां 35 विधेयकों को पारित कर दिया, वहीं राज्यसभा ने भी 30 बिलों को मंजूरी दे दी।

संसदीय इतिहास में पहली बार इतने बिलों को मंजूरी

संसदीय कार्य राज्यमंत्री प्रह्लाद जोशी के मुताबिक संसद का सत्र सात अगस्त तक चलेगा। इससे पहले केन्द्र सरकार को 99 फीसदी विधायी कार्यों को पूरा करने में सफलता मिली है। लोकसभा में अब पारित होने के लिए केवल तीन विधेयक ही लंबित हैं। कई जटिल विधेयक ऐसे भी रहे, जिन्हें जिस दिन सदन में पेश किया गया, उसी दिन पारित भी हो गए। इतना ही नहीं कोई भी विधेयक संसद की सेलेक्ट कमेटी या स्थायी कमेटी के पास नहीं भेजा गया। लोकसभा सचिवालय के अनुसार देश के संसदीय इतिहास में पहली बार इतने बिलों को मंजूरी मिली है। पहली बार लोकसभा बिना स्थगित हुए लगातार चली है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला भी सदन को स्थगित न करने के प्रति अडिग रहे और सदन के कामकाज को सुचारु रूप से चलाया।

भाजपा में शामिल हुए दूसरे दलों के राज्यसभा सांसद

संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब 23 मई 2019 को लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से अब तक कांग्रेस पार्टी के दो राज्यसभा सांसद संजय सिंह और भुबनेश्वर कलिता ने पार्टी तथा सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। संजय सिंह भाजपा में शामिल हो गए और राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के व्हिप प्रमुख कलिता भी जल्द ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं। वहीं समाजवादी पार्टी के तीन सांसद नीरज शेखर, सुरेन्द्र नागर और अखिलेश यादव के करीबी कहे जाने वाले संजय सेठ ने भी राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। नीरज शेखर भाजपाई हो चुके हैं। जल्द ही सुरेन्द्र नागर और सेठ के भी भाजपा के साथ जुडऩे की संभावना है।

आंध्र विधानसभा में भाजपा शून्य, लेकिन राज्यसभा सदस्य चार

आंध्र प्रदेश अकेला ऐसा राज्य है, जहां विधानसभा चुनावों में भाजपा का एक भी विधायक नहीं है, लेकिन भाजपा के पास चार राज्यसभा सांसद हैं। चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी के चार सांसदों ने अपनी पार्टी को छोड़कर एक साथ भाजपा का दामन थाम लिया। यह भी अपने आप में एक इतिहास है। भाजपा के नेता इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के प्रति देश की जनता का विश्वास बता रहे हैं।

जमकर हुई क्रॉस वोटिंग, विपक्ष में पड़ी फूट

संसद सत्र के दौरान विपक्षी राजनीतिक दलों के भीतर जमकर फूट देखने को मिली। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक-2019 को लेकर कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई। दीपेन्द्र हुड्डा, अदिती सिंह, रंजीता रंजन, पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार समेत तमाम नेताओं ने अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने का समर्थन किया। वहीं गुलाम नबी आजाद और लोकसभा में पार्टी के संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने इसका विरोध किया। यहां तक कि विपक्ष के साथ रहने वाली आम आदमी पार्टी ने भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक का समर्थन किया। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी भी इस विधेयक पर केन्द्र सरकार के साथ खड़ी नजर आई। तीन तलाक विधेयक और सूचना का अधिकार जैसे विधेयक भी विपक्ष की कमजोर रणनीति और राज्यसभा में सांसदों के अनुपस्थित रहने के चलते पारित हुए। विपक्ष का फ्लोर प्रबंधन जहां अस्त-व्यस्त दिखा, वहीं सत्ता पक्ष का फ्लोर प्रबंधन शानदार रहा।

कांग्रेस रोक सकती थी बाबरी मस्जिद का विध्वंस, दिग्विजय का तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार पर निशाना

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस को रोका जा सकता था, लेकिन उनकी पार्टी की सरकार की निष्क्रियता के कारण ऐसा नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा कि हालांकि उन्हें अंदर की कहानी का पता नहीं था, लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को सुप्रीम कोर्ट में पेश वीएचपी के शपथ हलफनामों पर विश्वास कर बैठे।

क्या बोले दिग्विजय: कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, ‘तथ्य यह है कि हमारी नाकामी और मैं व्यक्तिगत तौर पर इसके लिए दोषी महसूस करता हूं। अगर कांग्रेस ने तब ऐहतियाती कदम उठाए होते और सेना तथा केंद्रीय सुरक्षा बलों को स्थान की रक्षा करने दी होती तो वह बाबरी मस्जिद विध्वंस रोक सकती थी।’ उन्होंने बताया कि वह उस समय भोपाल में थे।
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अर्जुन सिंह के बारे में बताई यह बात: दिग्विजय सिंह ने इस घटना के फ़ौरन बाद नरसिम्हा राव सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे अर्जुन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा नहीं देने पर बताया कि ‘उन्होंने अर्जुन सिंह से बात की थी और वह बाबरी विध्वंस के अगले ही दिन इस्तीफा देना चाहते थे लेकिन दोपहर में शायद उन्होंने सोचा कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ खड़ा होना चाहिए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर प्रतिदिन सुनवाई हो रही है। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ इस विवाद की सुनवाई कर रही है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि इस मामले में मध्यस्थता की कोशिश सफल नहीं हुई है।

कांग्रेस नेता कर्ण सिंह ने आर्टिकल 370 और 35A पर दी सलाह, सरकार बरते ये सावधानियां

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के राज्याधिकारी, सदरे रियासत और प्रथम राज्यपाल रहे डॉ. कर्ण सिंह चाहते हैं कि प्रदेश से जुड़े संवैधानिक मसलों पर सरकार को सतर्कता बरतनी चाहिए. कर्ण सिंह के पिता महाराजा हरि सिंह उनको प्यार से टाइगर कहकर बुलाते थे. वह 20 जून 1949 को जम्मू-कश्मीर के राज्याधिकारी बने और बाद में 17 नवंबर 1952 से लेकर 30 मार्च 1965 तक सदरे रियासत के पद पर बने रहे. डॉ. कर्ण सिंह 30 मार्च 1965 को जम्मू-कश्मीर के पहले राज्यपाल बने. 

भारत की आजादी के आरंभिक वर्षो के दौरान कश्मीर की राजनीति के केंद्र में होने के बावजूद किसी राजनीतिक दल ने कश्मीर समस्या के समाधान में उनकी दूरदर्शिता और बुद्धिमता का उपयोग नहीं किया. देश के नए गृहमंत्री अमित शाह विवादित मसलों का अब हमेशा के लिए समाधान करने की कोशिश में जुटे हैं. आईएएनएस ने जम्मू-कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह के पुत्र 88 वर्षीय कर्ण सिंह से बातचीत के दौरान उनसे प्रदेश के लिए भावी कार्रवाई को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल किए जो तत्काल मरहम लगाने और मसले का समाधान करने के लिए आवश्यक है. 

तीक्ष्ण स्मरणशक्ति वाले डॉ. कर्ण सिंह ने कहा, “विलय अंतिम और अटल है, मैं इसके वजूद पर सवाल नहीं उठा रहा हूं. जम्मू-कश्मीर संविधानसभा ने विलय की पुष्टि की और इसे विधिमान्य ठहराया. इसलिए इसकी सत्यता पर कोई सवाल नहीं किया जा सकता है. विधिक, नैतिक और संवैधानिक तौर पर प्रदेश भारत का अंग है. हालांकि, अनुच्छेद 370 और 35ए पर मैं काफी सावधानी बरतने की सलाह दूंगा. इन पर सावधानी बरती जाए क्योंकि इनमें कानूनी, राजनीतिक, संवैधानिक और भावनात्मक कारक शामिल हैं, जिनकी पूरी समीक्षा की जानी चाहिए. मेरा मानना है कि यही उचित चेतावनी है.”

इस पर दोबारा सवाल करने पर उन्होंने कहा, “इस समस्या के चार अहम पहलू हैं. सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय पहलू जुड़ा है क्योंकि प्रदेश का 45 फीसदी क्षेत्र और 30 फीसदी आबादी (26 अक्टूबर 1947 से) विगत वर्षो में निकल चुकी है. याद कीजिए, पाकिस्तान और चीन ने हमारे क्षेत्र को हथिया लिया है. हम इनकार की मुद्रा में रह सकते हैं और हर बार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की बात कर सकते हैं, लेकिन गिलगित, बाल्टिस्तान और उत्तरी क्षेत्रों, मुख्य रूप से अक्साई चिन और काराकोरम के पार के क्षेत्र से सटी शाक्सगम और यरकंद नदी घाटी को छोड़ दिया जाता है.”

उन्होंने कहा, “दरअसल, 1963 तक अंतिम हिस्से को पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर का हिस्सा माना जाता था. यह कहना आसान है कि कश्मीर हमारा है, लेकिन 50 साल से मैं दिल्ली में हूं और मैंने इस बदनसीब प्रदेश के दर्द को दिल्ली और भारत में नहीं देखा है. सिर्फ दिखावटी प्रेम प्रदर्शित किया गया है.” कर्ण सिंह के अनुसार, दूसरा पहलू, केंद्र और राज्य के बीच संबंध है जिसके तहत कई संवदेनशीलताओं का समीकरण बनता है. 

कर्ण सिंह ने बीती बातों को याद करते हुए कहा, “जब बापूजी (महाराजा हरि सिंह) ने जम्मू में विलय संधि पर हस्ताक्षर किए थे तो उन्होंने सिर्फ तीन मुद्दों पर हस्ताक्षर किए थे. विलय संधि के तहत जम्मू-कश्मीर ने सिर्फ तीन विषयों का समर्पण किया था, जिनमें रक्षा, विदेश मामला और भारत के साथ संचार और उन्होंने भारत से आश्वासन लिया था कि जम्मू-कश्मीर के लोग अपनी संविधान सभा के जरिए अपने संविधान का मसौदा तैयार करेंगे, जो हुआ.”

उन्होंने बताया, “मैंने पंडित (जवाहरलाल) नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच दिल्ली समझौता के आधार पर संविधान सभा बुलाई. प्रदेश की संविधान सभा द्वारा जम्मू-कश्मीर का संविधान बनाया गया और 26 जनवरी 1957 को मेरे हस्ताक्षर से वह कानून बन गया. याद कीजिए, शेख अब्दुल्ला को पहले ही 1953 में गिरफ्तार कर लिया गया था. अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए दोनों अस्तित्व में आए और उनको जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की मंजूरी के बिना बदला नहीं जा सकता है, जिसे उसी समय भंग कर दिया गया.”

कर्ण सिंह के अनुसार, तीसरा पहलू क्षेत्रीय आकांक्षाएं हैं जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि जम्मू-कश्मीर अब तीन स्पष्ट भाषाई और भौगोलिक संभागों में बंटा हुआ है. ये संभाग हैं- जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख और 72 साल की अवधि बीत जाने के बाद भी ये संभाग एकीकृत नहीं हैं. 

कर्ण सिंह ने कहा कि चौथा मानवतावादी पहलू है. पूरी घाटी में कब्रिस्तान हैं. हजारों लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं. कश्मीरी पंडितों को अपने घर से पलायन करना पड़ा है और अनेक लोग अभी तक जम्मू और उधमपुर के शिविरों में निवास कर रहे हैं. डोगरा को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं. सीमावर्ती गांवों में निवास करने वाले लोगों का जीवन रोज नारकीय बना हुआ है जहां लगातार गोलाबारी चलती रहती है. 

जम्मू-कश्मीर में 370 हटने की हुई घोषणा, श्रीनगर में सचिवालय पर फहराया गया तिरंगा झंडा

श्रीनगर। पिछले दो दिनों की कवायद के बाद आखिरकार आज जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के अलावा राज्य के पुनर्गठन के बिलों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। बुधवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रोविजन्स के हटने की घोषणा कर दी और इसी के साथ 70 सालों बाद जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश बन गया।

श्रीनगर में सचिवालय पर राज्य के झंडे के साथ बड़ी शान से तिरंगा फहराया गया और बहती हवा में लहराता भी नजर आया। इस एतिहासिक मौके का वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। अब तक राज्य का अपना अलग संविधान और झंडा था लेकिन अब राज्य एक केंद्र शासित प्रदेश होगा जिसकी विधायिका भी होगी।राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 370 को हटाने वाले संकल्प को राज्यसभा और लोकसभा में मंजूरी मिलने के बाद राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के क्लॉज 3 के साथ पठित अनुच्छेद 370 के क्लॉज 1 के द्वारा राष्ट्रपति को दिए गए अधिकार के आधार पर राष्ट्रपति संसद की रिकमंडेशन पर यह घोषणा करते हैं कि आज यानि 6 अगस्त 2019 से अनुच्छेद 370 के सभी क्लॉजेस प्रभाव में नहीं रहेंगे।’