आकाश विजय वर्गीय को जमानत मिली, आज जेल से बाहर आये.

इंदौर इंदौर नगर निगम के अधिकारी को क्रिकेट बैट से पीटने के बहुचर्चित मामले और एक अन्य प्रकरण में भोपाल की विशेष अदालत ने बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय को जमानत दे दी है। आकाश रविवार की सुबह जेल से बाहर आ गए। बाहर आने के बाद आकाश ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जेल में उनका समय अच्छा बीता है। साथ ही बीजेपी विधायक ने यह भी कहा कि वह जनता की सेवा करते रहेंगे। 

भोपाल की विशेष अदालत ने शनिवार को ही आकाश को जमानत दे दी थी। पर, लॉकअप के तय समय तक स्थानीय जेल प्रशासन को जमानत का अदालती आदेश नहीं मिल पाने के कारण उन्हें कारागार में ही लगातार चौथी रात गुजारनी पड़ी। जेल से बाहर आने पर आकाश ने कहा, ‘मैं जनता की सेवा करता रहूंगा जेल में समय अच्छा बीता है। ऐसी स्थिति में जबकि पुलिस के सामने ही किसी महिला को घसीटा जा रहा था, मैं कुछ और करने की नहीं सोच सकता था। इसलिए मैंने जो कुछ भी किया उसे लेकर शर्मिंदा नहीं हूं। हां, मैं भगवान से जरूर प्रार्थना करूंगा कि वह दोबारा मुझे ‘बल्लेबाजी’ करने का अवसर ना दे।’

कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं आकाश 
बता दें कि आकाश बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। शहर के गंजी कम्पाउंड क्षेत्र में एक जर्जर भवन ढहाने की मुहिम के विरोध के दौरान आकाश ने नगर निगम के एक अधिकारी को क्रिकेट के बैट से पीट दिया था। कैमरे में कैद पिटाई कांड में गिरफ्तारी के बाद विजयवर्गीय को बुधवार को यहां एक स्थानीय अदालत के सामने पेश किया गया था। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बीजेपी विधायक की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके साथ ही, उन्हें 11 जुलाई तक न्यायिक हिरासत के तहत जिला जेल भेज दिया था। 

सीएम का पुतला जलाने के मामले में भी औपचारिक गिरफ्तारी 
न्यायिक हिरासत के तहत जेल में बंद रहने के दौरान बीजेपी विधायक को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का पुतला जलाने के पुराने मामले में गुरुवार को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि अघोषित बिजली कटौती को लेकर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने विजयवर्गीय की अगुवाई में चार जून को शहर के राजबाड़ा चौराहे पर प्रदर्शन के दौरान यह पुतला जलाया था, लेकिन इस प्रदर्शन के लिये प्रशासन से कोई अनुमति नहीं ली गयी थी। लिहाजा विजयवर्गीय और बीजेपी के अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भारतीय दण्ड विधान की धारा 188 (किसी सरकारी अधिकारी के आदेश की अवज्ञा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 

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