उत्तर प्रदेश की राजनीति ने कारगर सिद्ध कर दी बसपा प्रमुख की धमकी


बसपा प्रमुख मायावती की धमकी के बाद  मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार के अप्रैल 2018 में एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के खिलाफ दलित संगठनों के भारत बंद के दौरान दर्ज मुकदमे वापस लेने के एलान पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस धमकी को कारगर सिद्ध करने के पीछे सबसे बड़ा कारण उत्तर प्रदेश की राजनीति है। 

आगामी लोकसभा चुनावों में वहां सपा-बसपा गठबंधन के प्रबल आसार हैं और दोनों ही दल लगातार कांग्रेस को गठबंधन से दूर रखने की बात कर रहे हैं। पिछली बार 80 में से 71 सीटें जीतने वाली भाजपा अपने लिए सपा-बसपा गठबंधन को ही सबसे बड़ी चुनौती मान रही है। हालांकि पिछली बार बसपा यूपी में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, वहीं सपा पांच और कांग्रेस दो सीट जीत पाई। विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की थी। 

लेकिन बीते कुछ समय में हालात बदले हैं और गत दिसंबर में मप्र, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा से सत्ता छीनकर कांग्रेस मजबूत हुई है। फिर भी राजनीतिक लिहाज से सबसे बड़े व महत्वपूर्ण सूबे यूपी में कांग्रेस अभी भी अकेले दम पर भाजपा को पटकनी देने में सक्षम नहीं दिखती। इसलिए उसे सपा-बसपा के साथ गठबंधन में ही फायदा दिख रहा है। तीनों ही राज्यों में बसपा ने भी कुछ सीटें जीती हैं। 

दोनों राज्यों में बसपा के समर्थन वापस लेने का नहीं पड़ता कोई असर

मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसपा ने कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की थी। वैसे आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो दोनों राज्यों में बसपा के समर्थन वापस लेने से भी कांग्रेस सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता।

मध्य प्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें हैं। वहां बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए। कांग्रेस 114 और बसपा 2 सीटों पर जीती। कांग्रेस को चार निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है जो उसके बागी के रूप में ही चुनाव मैदान में थे। यहां बसपा के 2 और सपा के एक विधायक के बिना भी कांग्रेस के पास 118 विधायक हैं।

राजस्थान में कुल 200 सीटों में से 199 पर चुनाव हुए। इसलिए बहुमत के लिए 100 सीटें चाहिए थीं। कांग्रेस के 99 विधायक हैं जबकि एक विधायक रालोद का है जिसका कांग्रेस के साथ गठबंधन है। हालांकि बसपा के 6 विधायक हैं लेकिन उसके समर्थन के बिना ही कांग्रेस के पास 100 विधायक हैं।

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