जजों से बोले जस्टिस/ दुष्कर्म केस में सजा सुनाने में जल्दबाजी क्यों, गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाना है क्या?

दुष्कर्म के 6 माह, 7 केस; सभी मामलों में सुनाई गई फांसी की सजा छह साल में पॉक्सो एक्ट के 658 केस हो गए लंबित, दूसरी तरफ छह घंटे, 23 और 31 दिन में सजा

इंदौर.   मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य बेंच के सीनियर जस्टिस चंद्रहास सिरपुरकर और सुजॉय पॉल ने हाल ही में वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रदेश के जजों की क्लास ली। उन्होंने प्रदेश में दुष्कर्म के मामलों में 6 माह में सात प्रकरणों में फांसी की सजा सुनाए जाने पर कहा कि जज इतनी जल्दी में क्यों हैं, जबकि करीब 5 साल में यह संख्या चार-पांच थी। क्या जजों को लिम्का बुक या गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाना है? ऐसा नहीं है कि फांसी की सजा देने पर कोई मनाही है, लेकिन यह सिर्फ चर्चित प्रकरणों में ही क्यों हो रही है? सजा दिए जाने के पैमानों को फिर से परखने की जरूरत है।

निर्भया कांड के बाद 2012 में बने पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल अफेंसेस) एक्ट के छह साल में इंदौर में 636 मामलों में निराकरण हुआ, जबकि सितंबर 2018 तक 658 मामले पेंडिंग हैं। इनमें कई मामलों की सुनवाई चार-पांच साल से चल रही है। जस्टिस सिरपुरकर और जस्टिस पॉल ने मुख्य रूप से जो बातें कहीं, 
जजों को नाम भी छपवाना नहीं चाहिए : कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि फांसी रेयरेस्ट ऑफ द रेयर प्रकरणों में दी जाने वाली सजा है। जल्दबाजी में दिया गया फैसला कहीं न कहीं चिंता से ग्रस्त होता है। इसके अलावा जिन सात प्रकरणों में फांसी की सजा सुनाई, उनमें लगभग सभी पक्षकार ऐसे थे जिनका केस लड़ने के लिए कोई वकील नहीं था। उन्हें विधिक सहायता दी गई। ऐसे में यह भी देखना चाहिए कि केस लड़ने वाले कितने सक्षम वकील थे? जजों को नाम भी छपवाना नहीं चाहिए। मीडिया में जो फैसलें की खबर जाएंं उनके पदनाम से जाए, ताकि प्रतिस्पर्धा की भावना न खड़ी हो। 

इन फैसलों से कायम हुए न्याय पालिका के रिकॉर्ड :  इंदौर में 20 अप्रैल को राजबाड़ा के पास तीन महीने की बच्ची के अपहरण और दुष्कर्म मामले में ट्रायल शुरू होने के 23वें दिन ही जज ने फांसी की सजा सुना दी। 26 जून को मंदसौर में सात साल की बच्ची से दुष्कर्म हुआ था। 31 दिन में आरोपियों को फांसी की सजा दे दी थी। उज्जैन में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म करने वाले 14 साल के नाबालिग के खिलाफ चालान पेश होने के छह घंटे में ही कोर्ट ने दो साल की सजा सुनाकर नया इतिहास रच दिया।

इंदौर जिले के विभिन्न न्यायालयों में 636 मामलों में आ चुका है फैसला :  इंदौर जिले के विभिन्न न्यायालयों में पॉक्सो एक्ट के 658 मामले पेंडिंग हैं, जबकि 636 में फैसला आ चुका है। इस जानकारी का स्रोत देशभर के न्यायालयों की जानकारी रखने वाली एप्लीकेशन इकोर्ट्स सर्विसेस है। इस एप्लीकेशन में प्रतिदिन देशभर के न्यायालयों की जानकारी रियल टाइम में अपडेट की जाती है।

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